Thursday, February 26, 2015

पंखुरी सिन्हा की कवितायें






पंखुरी सिन्हा इन दिनों खूब सक्रिय हैं!  वे लगातार लिख रही हैं और केवल लेखन ही नहीं बल्कि  लेखन से जुडी अन्य गतिविधियों में भी अपनी  उल्लेखनीय उपस्थिति को बनाए हुए हैं!  आज स्वयंसिद्धा के पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं पंखुरी सिन्हा की कुछ कवितायें जो कि एक जागरूक कवि के गहन मानसिक विमर्श और आंतरिक संघर्ष से उपजी अनुभूतियाँ हैं जो विपरीत परिस्थितियों में अपना अंतर्विरोध बार-बार दर्ज कराती हैं........






(1)
शहर की धूल

अनदेखे फूलों में हम ढूंढते हैं
अपना प्रेमी
उठाने के बाद कुदाल, खुरपी, हंसिया भी
संभालने के बाद वह बागडोर
जो सत्ता ने छोड़ रखी है
मचाने के बाद वृक्षारोपण का हल्ला
कि लगाये जाएँ सड़क किनारे
नीम और पलाश
गुलमोहर और अमलतास
मेरी स्मृतियों में नहीं था
यह शहर इतना धूल भरा
लेकिन फूल कहते
देखी जाती है केवल
मेरी बातों में रंगीनी
जो बाढ़ ले आने, डुबोने
वाली बारिश में भी नहीं धुली
उस गर्त और गर्द को कैसे धो पायेगा
कोई भी पानी? कहीं का भी पानी?
जबकि यशस्वी हैं नदियां
बहुत पास
मनस्वी हैं नदियाँ
बहुत पास
और नदियों के नामों में अंचल के किस्से
कि आँचल के किस्से
फल्गू पर शास्त्रार्थ है
विमर्श भी
और नून नदी के किनारे
नहीं तोडा गांधी ने नमक कानून
जबकि प्रतीकात्मक होता है
सत्ता की खिलाफत का अस्त्र
लेकिन समुद्र तट से बहुत दूर के इस शहर में
जहाँ सैलानियों के वाहनो की भी धूल नहीं आती
वहां पेड़ों को जड़ से उखाड़ देने के बाद की
आवारा, बंजर धूल
कब बैठ जाएगी
मिटटी की एक परत बनकर?



(2)
शहर को परिभाषित करना

शहर को परिभाषित करना
सारे हादसों से
न मुनासिब
न जायज़
बिल्कुल सही दिखती है
ज़िन्दगी हमारी
बैठक खानो की बातों में
कहीं भी नहीं रिस रहा है
कुछ भी नहीं
न वज़ूद, न बर्तन
न फ्रिज तक पहुँचने वाले
बिजली के तार में
कोई गड़बड़ी है
न बाथरूम का स्विच ढीला है
न पडोसी की दीवार के आर पार
कुछ आ जा रहा है
न इसके साझे के होने से
इस पर टँगी तस्वीरों की मिलकियत को लेकर झगड़ा है
और साथ बैठ जाने पर
अगल बगल
जो बहुत चिकनी और मीठी बातें हैं
उनका वसा
कुछ वैसे ही आक्रमण कर रहा है
ह्रदय के चारो
कपाटो पर
जैसे काँच का बुरादा
मिला दिया गया हो
भोजन में.............










(3)

एक ही समय में

यह एक ही समय में था
कि सूडान से एक नया देश बनाने की बात करते करते
बन गया था दक्षिण सूडान नामक एक देश
और सीरिया में
राजा बदलने के युद्ध ने
तैयार कर दिया था बेघरों का काफिला
यह वही समय था
जब कैनेडियन इमीग्रेशन में फैली अराजकता
भ्रष्टाचार का नाम पाने के लिए
मुँह बाए खड़ी थी
बंद ही नहीं होती थी
शरणार्थियों, विद्यार्थियों से पैसे वसूलती
उसकी मुँहफ़टी, नयी झोली
और कैनेडियन अखबार भरे हुए थे
वेश्यावृति को कानूनी दर्ज़ा दिलाने की जिरहों से
और हिन्दुस्तानी वेब पत्रिकाओं में
तेलंगाना नामक एक प्रस्तावित राज्य के
सीमा निर्धारण की बहसें थीं
और हर जगह छिटपुट हिंसा थी
और कभी, कभी छिटपुट से ज़्यादा गंभीर भी
और यह वही समय था
जब उसकी पहचान की
ढेरो हिन्दुस्तानी लड़कियाँ
पढ़ने, बाहर विदेश जा रही थीं
और प्रेम जैसी बातों की अनिश्चितताओं को
संभालने के नाम पर
उभर रही थी
एक नए किस्म की पितृसत्ता
और उसके साथ
एक सर्वथा नयी अराजकता.............


(4)

जीवनशैलियाँ

वो लोग जो बहुत करीबी से
लोगों के बसने
बसाने सम्बन्धी
सभी निर्णयों की पड़ताल
करते रहते हैं
कौन कहाँ रहेगा अब
अब तक कहाँ रहता आया
इन सब बातों के बने होते हैं जिनके सवाल
जिनके आशय
इस किस्म के होते हैं
कि खानाबदोशी तो कोई ज़िन्दगी नहीं
उन्हें दरअसल उत्कट इच्छा होती है
भ्रमण की
नियंत्रण की भी
पर लोगों की ज़िंदगियाँ
न तो पर्यटन स्थल होती हैं
न भूदान को तैयार
ज़मीन का टुकड़ा
और न सरकारी या प्राइवेट किसी किस्म के टेक ओवर को तैयार
कोई जंग लगता कारखाना
वैसे खाना बदोशी कोई मनःस्थिति भी नहीं
और अलग किस्मों की मिटटी
फसल और जलवायु से प्रेम
खानाबदोशी नहीं।


(5)
बग़ावत की ख़ुशबू

अजब खुशबू होती है बग़ावत में
छा जाती है हर कुछ पर
जैसे लिपटे होते हैं
केवड़े के पेड़ पर साँप
जिनके पास स्थायित्व होता है
और अपनी एक ज़िन्दगी भी
उनकी इस खुशबू की तलाश
लगभग पुलिसिया होती है
लगभग ख़ुफ़िया
वो बगावत से बिखरे
टूटे लोगों की ज़िन्दगियों के बुरादों में
उस अथाह संगीत की चिंगारी चुनते फिरते हैं
जो केवल दर्द के सागर तले
उबलती, पकती है...........


****************



परिचय 


पंखुरी सिन्हा
संपर्क----A-204, Prakriti Apartments, Sector 6, Plot no 26, Dwarka, New Delhi 110075
ईमेल----nilirag18@gmail.com
फ़ोन -----9968186375

जन्म--- ---18 जून 1975

शिक्षा ---एम ए, इतिहास, सनी बफैलो, 2008
पी जी डिप्लोमा, पत्रकारिता, S.I.J.C. पुणे, 1998
बी ए, हानर्स, इतिहास, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1996

अध्यवसाय----BITV, और ‘The Pioneer’ में इंटर्नशिप, 1997-98
        ---- FTII में समाचार वाचन की ट्रेनिंग, 1997-98
        ----- राष्ट्रीय सहारा टीवी में पत्रकारिता, 1998—2000

 प्रकाशन---------हंस, वागर्थ, पहल, नया ज्ञानोदय, कथादेश, कथाक्रम, वसुधा, साक्षात्कार, बया, मंतव्य, आउटलुक, अकार, अभिव्यक्ति, जनज्वार, अक्षरौटी, युग ज़माना, बेला, समयमान, अनुनाद, सिताब दियारा, पहली बार, पुरवाई, लन्दन, पुरवाई भारत, लोकतंत्र दर्पण, सृजनगाथा, विचार मीमांसा, रविवार, सादर ब्लोगस्ते, हस्तक्षेप, दिव्य नर्मदा, शिक्षा व धरम संस्कृति, उत्तर केसरी, इनफार्मेशन2 मीडिया, रंगकृति, हमज़बान, अपनी माटी, लिखो यहाँ वहां, बाबूजी का भारत मित्र, जयकृष्णराय तुषार. ब्लागस्पाट. कॉम, चिंगारी ग्रामीण विकास केंद्र, हिंदी चेतना, नई इबारत, सारा सच, साहित्य रागिनी,साहित्य दर्पण आदि पत्र पत्रिकाओं में, रचनायें प्रकाशित, दैनिक भास्कर पटना में कवितायेँ एवं निबंध, हिंदुस्तान पटना में कविता एवं निबंध, हिंदिनी, हाशिये पर, हहाकार, कलम की शान, समास, गुफ्तगू, पत्रिका आदि ब्लौग्स व वेब पत्रिकाओं में, कवितायेँ तथा कहानियां, प्रतीक्षित

किताबें ----- 'कोई भी दिन' , कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2006
                  'क़िस्सा-ए-कोहिनूर', कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2008
                   'प्रिजन टॉकीज़', अंग्रेज़ी में पहला कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2013
‘डिअर सुज़ाना’ अंग्रेज़ी में दूसरा कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2014
श्री पवन जैन द्वारा सम्पादित शीघ्र प्रकाश्य काव्य संग्रह ‘काव्य शाला’ में कवितायेँ सम्मिलित
श्री हिमांशु जोशी द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘प्रतिनिधि आप्रवासी कहानियाँ’, संकलन में कहानी सम्मिलित
पुरस्कार---   राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013
पहले कहानी संग्रह, 'कोई भी दिन' , को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान
 ------------'कोबरा: गॉड ऐट मर्सी', डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यू जी सी, फिल्म महोत्सव में, सर्व श्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला -------------'एक नया मौन, एक नया उद्घोष', कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार, -------------1993 में, 
CBSE बोर्ड, कक्षा बारहवीं में, हिंदी में सर्वोच्च अंक पाने के लिए, भारत गौरव सम्मान

अनुवाद----कवितायेँ मराठी में अनूदित,
कहानी संग्रह के मराठी अनुवाद का कार्य आरम्भ, 
उदयन वाजपेयी द्वारा रतन थियम के साक्षात्कार का अनुवाद,

सम्प्रति----

पत्रकारिता सम्बन्धी कई किताबों पर काम, माइग्रेशन और स्टूडेंट पॉलिटिक्स को लेकर, ‘ऑन एस्पियोनाज़’, एक किताब एक लाटरी स्कैम को लेकर, कैनाडा में स्पेनिश नाइजीरियन लाटरी स्कैम, और एक किताब एकेडेमिया की इमीग्रेशन राजनीती को लेकर, ‘एकेडेमियाज़ वार ऑफ़ इमीग्रेशन’,

Tuesday, February 24, 2015

धर्म, धर्म प्रचार और धर्मांतरण एक आम स्त्री की नज़र से

अभी संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले से लौटते हुए मेरे साथ कई पसंदीदा किताबों के साथ हिंदी में अनूदित 'पवित्र क़ुरान' भी थी जो मुझे मुफ्त में मिली!  इसके अतिरिक्त इस्लाम से सम्बंधित कुछ छोटी बुकलेट भी जो वहां आने जाने वालों को साग्रह भेंट की जा रही थी!   ये पहले भी होता रहा है!  इससे पहले तो एक बार मैं मेले से खरीद कर अपने मुस्लिम मित्र को भेंट भी कर चुकी हूँ!  पिछले साल वाली क़ुरान पढ़ने के बाद मेरी बेटी की एक दोस्त को भेंट कर दी गई!  ये मुफ्त में किताब बाँटने वालों को देखकर मेरी स्मृतियाँ अतीत की ओर सफर पर निकल जाती हैं और मुझे स्कूल का वक़्त याद आता है!  स्कूल काफी दूर था और पैदल लौटते हुए एक जगह ऐसी आती थी जहाँ आमने-सामने दो स्कूल बने हुए थे!  छुट्टी के वक़्त वहां छात्रों का हुजूम होता और अक्सर एक स्कूल के बाहर ईसाई धर्म  संबंधित सामग्री वितरित करने वाले लोग  खड़े होते!  कुछ बच्चे मुंह बिचकाते और कुछ उन्हें लेकर थोड़ी दूर जाकर फेंक देते!  कुछ मेरी तरह जिज्ञासु होते जो आग्रहपूर्वक लेकर बैग में रख लेते!  मेरी परवरिश ऐसे माहौल में हुई थी जहाँ दूसरे धर्मों को लेकर विचारों में कोई संकीर्णता या संकुचन नहीं था, दूसरे मुझे पढ़ने की लत थी, मुझे सब जानना था, सब कुछ तो मैं बड़े शौक़ से वह सामग्री जिसमें कुछ किताबें, छोटी बुकलेट, पैम्फलेट, धार्मिक किताबों के कैटेलॉग आदि हुआ करते थे, संजो लेती और पहली फुर्सत में सब पढ़ डालती!





उस वक़्त शायद मैंने ऐसा न भी सोचा हो पर आज सोचती हूँ तो पाती हूँ कि वे सारी किताबें ईश्वर के पुत्र प्रभु यीशु के  चमत्कारों से भरी होतीं!  चमत्कारपूर्ण ढंग से रोटी के टुकड़ों और थोड़े से शायद भेड़ के  दूध से ढेर से लोगों का पेट भरते यीशु जिन्हे पढ़कर अक्सर मुझे 'फिल्मन और  बांसिस' की कहानी याद आ जाती जहाँ जग जैसे एक अक्षय पात्र की तली में  दूध का छोटा फव्वारा होता जो कभी उसे खाली नहीं होने देता था या फिर याद आता द्रौपदी का अक्षय-पात्र जो दुर्वासा मुनि की पूरी मण्डली का पेट भर देता!   तो ये चमत्कार से भरी किताबें जहाँ धर्म के बारे में कम लिखा होता था पर गरीबी में डूबे तीसरी दुनिया के मज़लूम  लोगों के लिए ये एक आह्वान होता कि चले आओ, यीशु की शरण में तुम्हारे सब दुःख दूर करेगा!  यहाँ धर्म की गूढ़ बातें कम थीं, पूरा जोर इसी बात पर होता कि यीशु ही सब दुखों और परेशानियों से निजात दिला सकता है!

मैंने गीताप्रेस की सस्ते दामों वाली किताबों को भी खूब देखा पढ़ा है पर मुझे कभी समझ नहीं आया कि ये कैसा धर्म प्रचार है, कितनी आतुरता है कि जहाँ चुम्बक की तरह दूसरे धर्मावलम्बियों को अपनी ओर खींचने की होड़ लगी है!  हिन्दू धर्म की धार्मिक किताबें भी ऐसी ही चमत्कारपूर्ण घटनाओं से भरी हुई होती हैं!  यहाँ जातीयता अपने सबसे अधिक घृणित रूप में पाई जाती हैं किन्तु मूल रूप से हिन्दू धर्म में उस कट्टरता का सर्वथा अभाव देखा मैंने जहाँ दूसरे धर्मों को बुरा ठहराया जाये या उनसे दूरी बनाई जाये और उन्हें हिन्दू धर्म को अपनाने को डर, आग्रहपूर्ण तरीकों या प्रलोभनों का सहारा लिया जाये!  इसके ठीक विपरीत हिन्दू धर्म से   बौद्ध, जैन, सिख धर्म और कितने ही पंथों आदि के रूप में शाखाएं समय समय पर निकलती रही!   जातीयता, भेदभाव,  छुआछूत जैसी तमाम घृणित कुरीतियां, अशिक्षा  और गरीबी आदि कई कारण रहे जो हिन्दू धर्म की तथाकथित निचली जातियों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित करते रहे!  और बहुधा यह जबरन भी हुआ पर हिन्दू धर्म की ओर से धर्मांतरण के इतने आग्रहपूर्वक प्रयास किये गए हों मैं अक्सर ऐसे उदाहरणों की खोज में रहती हूँ!

क़ुरान  की बात की जाये तो यहाँ अक्सर इस्लाम के साथ साथ गैर-इस्लामी धर्म और लोगों की बात बार-बार कई तरीकों से  और कई सन्दर्भों में  आती है!  हमारे  एक रोशन ख्याल मुस्लिम पडोसी और पारिवारिक मित्र जो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे,  ने कई बार इसकी चर्चा की!  वे बताते थे कि क़ुरान में जेहाद या जिहाद उस तरह से वर्णित नहीं है जैसा और जितना हदीस में है!  उनके अनुसार हदीस मुहम्मद साहब के कई सौ साल बाद उतारी गई!  इस बात के सही या गलत होने से कहीं ज्यादा ये सोचा जाना जरूरी है कि घर वापसी जैसी बातें, हिन्दू होने का तथाकथित गर्व, मंदिर वहीँ बनाएंगे जैसी तमाम बातों से मुक्त रहा है हमारी पीढ़ी का बचपन जहाँ हिन्दू धर्म अपनी सहिष्णुता के लिए सचमुच गर्व का ही कारण था! घर वापसी जैसे प्रयास हास्यास्पद कहे जा सकते हैं जब तक हिन्दू धर्म अपने ही धर्म के लोगों को जातीय वर्गीकरण से मुक्ति दे उन्हें सम्मानजनक परिस्थितियों में जीने का अवसर प्रदान न करे!  आप कितनी भी वापसी कराएं, ये धर्मान्तरण उसी गति से होते रहेंगे जैसे अतीत में होते आएं हैं, जरूरत है तो इन तमाम बातों से ऊपर उठकर निचले तबके के उद्धार के लिए सुनियोजित तरीके से बराबर और समुचित प्रयास करने की ताकि समानता से जीने के अवसर सभी जातियों को  बराबर मिले!  जब एक ही धर्म के लोग समान धरातल पर खड़े हो जीने के समान अवसर और सम्मान पाएंगे तभी  घर वापसी  और धर्मांतरण जैसे शब्द अतीत की विषयवस्तु बन सदा के लिए अप्रासंगिक हो जाएँगें और हम गर्व से कह पाएंगे, "हाँ हम हिन्दू हैं!"



Saturday, February 21, 2015

कविता पोस्टर - निरंजन श्रोत्रिय




स्वयंसिद्धा  पर आप अक्सर कवितायें पढ़ते हैं!  वरिष्ठ कवि निरंजन श्रोत्रिय जी ने  मेरे अनुरोध पर पाठकों के लिए अपनी सार्थक कविताओं के कुछ सुंदर और दर्शनीय कविता पोस्टर भेजे हैं!  तो पोस्टर पढ़िए और कविताओं को सराहिये !  ये नवीन प्रयोग कैसा लगा, बताना न भूलें.......

कविता पोस्टर 






































































































































Tuesday, February 17, 2015

रंग बदलता मौसम (कहानी-सुभाष नीरव)





वरिष्ठ कथाकार सुभाष नीरव जी लघुकथा और अनुवाद के क्षेत्र में जाना-माना नाम हैं!  लेकिन पिछले दिनों मध्यमवर्गीय सरोकारों के बीच बुनी गई उनकी कई मार्मिक कहानियां भी पढ़ने को मिली!  स्वयंसिद्धा के पाठकों के लिए प्रस्तुत है आज उनकी एक कहानी - ‘रंग बदलता मौसम’!  बदलते मौसम के साथ रंग बदलते रिश्तों की एक दास्तान! उल्लेखनीय है इसी कहानी पर उन्हें राजस्थान पत्रिका द्वारा ‘सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार -2011 से सम्मानित किया जा चुका है……






रंग बदलता मौसम 


पिछले कई दिनों से दिल्ली में भीषण गरमी पड़ रही थी लेकिन आज मौसम अचानक खुशनुमा हो उठा था। प्रात: से ही रुक-रुक कर हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। आकाश काले बादलों से ढका हुआ था। धूप का कहीं नामोनिशान नहीं था।

      मैं बहुत खुश था। सुहावना और खुशनुमा मौसम मेरी इस खुशी का एक छोटा-सा कारण तो था लेकिन बड़ा और असली कारण कुछ और था। आज रंजना दिल्ली आ रही थी और मुझे उसे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रिसीव करने जाना था। इस खुशगवार मौसम में रंजना के साथ की कल्पना ने मुझे भीतर तक रोमांचित किया हुआ था। 

      हल्की बूंदाबांदी के बावजूद मैं स्टेशन पर समय से पहले पहुँच गया था। रंजना देहरादून से जिस गाड़ी से आ रही थी, वह अपने निर्धारित समय से चालीस मिनट देर से चल रही थी। गाड़ी का लेट होना मेरे अंदर खीझ पैदा कर रहा था लेकिन रंजना की यादों ने इस चालीस पैंतालीस मिनट के अन्तराल का अहसास ही नहीं होने दिया। 

      परसों जब दफ्तर में रंजना का फोन आया तो सिर से पांव तक मेरे शरीर में खुशी और आनन्द की मिलीजुली एक लहर दौड़ गई थी। फोन पर उसने बताया था कि वह इस रविवार को मसूरी एक्सप्रेस से दिल्ली आ रही है और उसे उसी दिन शाम चार बजे की ट्रेन लेकर कानपुर जाना है। बीच का समय वह मेरे संग गुजारना चाहती थी। उसने पूछा था-''क्या तुम आओगे स्टेशन पर ?''

      ''कैसी बात करती हो रंजना ! तुम बुलाओ और मैं न आऊँ, यह कैसे हो सकता है ? मैं स्टेशन पर तुम्हारी प्रतीक्षा करता खड़ा मिलूँगा।''

      फोन पर रंजना से बात होने के बाद मैं जैसे हवा में उड़ने लगा था। बीच का एक दिन मुझसे काटना कठिन हो गया था। शनिवार की रात बिस्तर पर करवटें बदलते ही बीती।



करीब चारेक बरस पहले रंजना से मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में ही हुई थी- एक परीक्षा केन्द्र पर। हम दोनों एक नौकरी के लिए परीक्षा दे रहे थे। परीक्षा हॉल में हमारी सीटें साथ-साथ थीं। पहले दिन सरसरी तौर पर हुई हमारी बातचीत बढ़कर यहाँ तक पहुँची कि पूरी परीक्षा के दौरान हम एक साथ रहे, एक साथ हमने चाय पी, दोपहर का खाना भी मिलकर खाया। वह दिल्ली में अपने किसी रिश्तेदार के घर में ठहरी हुई थी। तीसरे दिन जब हमारी परीक्षा खत्म हुई तो रंजना ने कहा था-''मैं पेपर्स की थकान मिटाना चाहती हूँ अब। इसमें तुम मेरी मदद करो।''

      पिछले तीन दिनों से परीक्षा के दौरान हम दिन भर साथ रहे थे। अब परीक्षा खत्म होने पर रंजना का साथ छूटने का दुख मुझे अंदर ही अंदर सता रहा था। मैंने रंजना की बात सुनकर पूछा- ''वह कैसे ?''

      ''मैं दिल्ली अधिक घूमी नहीं हूँ। कल दिल्ली घूमना चाहती हूँ। परसों देहरादून लौट जाऊँगी।'' कहते हुए वह मेरे चेहरे की ओर कुछ पल देखती रही थी। 

      मैं उसका आशय समझ गया था। उसके प्रस्ताव पर मैं खुश था लेकिन एक भय मेरे भीतर कुलबुलाने लगा था। बेकारी के दिन थे। घर से दिल्ली में आकर परीक्षा देने और यहाँ तीन दिन ठहरने लायक ही पैसों का इंतज़ाम करके आया था। मेरी जेब में बचे हुए पैसे मुझे रंजना के साथ पूरा दिन दिल्ली घूमने की इजाज़त नहीं देते थे।

      ''दिल्ली तो मैं भी पहली बार आया हूँ, इस परीक्षा के सिलसिले में। घूमना तो चाहता हूँ पर...।''

      ''पर वर कुछ नहीं। कल हम दोनों दिल्ली घूमेंगे, बस।'' रंजना ने जैसे अन्तिम निर्णय सुना दिया। परीक्षा केन्द्र इंडिया गेट के पास था। वह बोली, ''कल सुबह नौ बजे तुम यहीं मिलना।''

      यूँ तो मुझे परीक्षा समाप्त होते ही गांव के लिए लौट जाना था, पर रंजना की बात ने मुझे एक दिन और दिल्ली में रुकने के लिए मजबूर कर दिया। मैं पहाड़गंज के एक छोटे-से होटल में एक सस्ता सा कमरा लेकर ठहरा हुआ था। जेब में बचे हुए पैसों का मैंने हिसाब लगाया तो पाया कि कमरे का किराया देकर और वापसी की ट्रेन का किराया निकाल कर जो पैसे बचते थे, उसमें रंजना को दिल्ली घुमाना कतई संभव नहीं था। बहुत देर तक मैं ऊहापोह में घिरा रहा था- गांव लौट जाऊँ या फिर ...। रंजना की देह गंध मुझे खींच रही थी। मुझे रुकने को विवश कर रही थी। और जेब थी कि गांव लौट जाने को कह रही थी।

      फिर मैंने एक फैसला किया। रुक जाने का फैसला। इसके लिए मुझे गले में पहनी पतली-सी सोने की चेन और हाथ की घड़ी अपनी जेब कट जाने का बहाना बनाकर पहाड़गंज में बेचनी पड़ी थी। अगले दिन मैं समय से निश्चित जगह पर पहुँच गया था। रंजना भी समय से आ गई थी। वह बहुत सुन्दर लग रही थी। उसका सूट उस पर खूब फब रहा था। उसके चेहरे पर उत्साह और उमंग की एक तितली नाच रही थी। एकाएक मेरा ध्यान अपने कपड़ों की ओर चला गया। मैं घर से दो जोड़ी कपड़े लेकर ही चला था। मेरी पैंट-कमीज और जूते साधारण-से थे। मन में एक हीन भावना रह रह कर सिर उठा लेती थी। मेरे चेहरे को पढ़ते हुए रंजना ने कहा था, ''तुम कुछ मायूस-सा लगते हो। लगता है, तुम्हें मेरे संग दिल्ली घूमना अच्छा नहीं लग रहा।''

      ''नहीं, रंजना। ऐसी बात नहीं।'' मेरे मुंह से बस इतना ही निकला था।

      हम दोनों ने उस दिन इंडिया गेट, पुराना किला, चिड़िया घर, कुतुब मीनार सैर की। दोपहर में एक ढाबे पर भोजन किया। सारे समय हँसती-खिलखिलाती रंजना का साथ मुझे अच्छा लगता रहा था।



साल भर बाद इंटरव्यू के सिलसिले में हम फिर मिले थे। हमने फिर पूरा एक दिन दिल्ली की सड़कें नापी थीं। इसी दौरान रंजना ने बताया था कि उसके बड़े भाई यहाँ दिल्ली में एक्साइज विभाग में डेपूटेशन पर आने वाले हैं। उसने मुझे उनका पता देते हुए कहा था कि मैं उनसे अवश्य मिलूं।



      कुछ महीनों बाद मुझे दिल्ली में भारत सरकार के एक मंत्रालय में नौकरी मिल गई। मैं रंजना के बड़े भाई साहब से उनके ऑफिस में जाकर मिला था। वह बड़ी गर्मजोशी में मुझसे मिले थे। उनसे ही पता चला कि नौकरी की ऑफर तो रंजना को भी आई थी, पर इस दौरान देहरादून के केन्द्रीय विद्यालय में बतौर अध्यापक नियुक्ति हो जाने के कारण उसने दिल्ली की नौकरी छोड़ दी थी। मैं उन्हें अपने ऑफिस का फोन नंबर देकर लौट आया था। मुझे रंजना का दिल्ली में नौकरी न करना अच्छा नहीं लगा था। फिर भी, मुझे उम्मीद थी कि रंजना से मेरी मुलाकात अवश्य होगी। लेकिन, रंजना के बड़े भाई साहब कुछ समय बाद दिल्ली से चंडीगढ़ चले गए और मेरे मन की चाहत मेरे मन में ही रह गई थी।



ट्रेन शोर मचाती हुई प्लेटफॉर्म पर लगी तो मैं अपनी यादों के समन्दर से बाहर निकला। रंजना ने मुझे प्लेटफॉर्म पर खड़ा देख लिया था। ट्रेन से उतरकर वह मेरी ओर बढ़ी। आज वह पहले से अधिक सुन्दर लग रही थी। सेहत भी उसकी अच्छी हो गई थी। सामान के नाम पर उसके पास एक बड़ा-सा अटैची था और कंधे पर लटकता एक छोटा-सा काला बैग। उसने कुली को आवाज़ दी। मैंने कहा, ''कुली की क्या ज़रूरत है। तेरे पास एक ही तो अटैची है। मैं उठा लूंगा।'' और मैंने अटैची पकड़ लिया था।

      प्लेटफॉर्म पर चलते हुए रंजना ने कहा, ''मनीष, मेरे पास चार-पाँच घंटों का समय है। कानपुर जाने वाली शाम चार बजे वाली गाड़ी की मैंने रिजर्वेशन करा रखी है। ऐसा करती हूँ, सामान मैं यहीं लॉक अप में रखवा देती हूँ और रिटायरिंग रूम में फ्रैश हो लेती हूँ। फिर हम शॉपिंग के लिए निकलेंगे। ठीक।''

      मुझे भी रंजना का यह प्रस्ताव अच्छा लगा। मैं जहाँ रह रहा था वह जगह स्टेशन से काफी दूर थी, वहाँ आने-जाने में ही दो घंटे बर्बाद हो जाने थे। रिटायरिंग रूम में फ्रैश होने के बाद रंजना ने अटैची को लॉक अप में रखवाया और फिर हम दोनों स्टेशन से बाहर निकले। सवा ग्यारह बजे रहे थे। मैंने पूछा- ''किधर चलोगी शॉपिंग के लिए ?''

      ''करोल बाग चलते हैं।'' रंजना जैसे पहले से ही तय करके आई थी।

      मैंने एक ऑटो वाले से बात की और करोल बाग के लिए चल दिए। ऑटो में सट कर बैठी रंजना की देह गंध मुझे दीवाना बना रही थी। मैंने चुटकी ली, ''पहले से कुछ मुटिया गई हो। टीचर की नौकरी लगता है, रास आ गई है।''

      ''तुम्हें मैं मोटी नज़र आ रही हूँ ?'' रंजना ने ऑंखें तरेरते हुए मेरी ओर देखकर कहा।

      ''मोटी न सही, पर पहले से सेहत अच्छी हो गई है। और सुन्दर भी हो गई हो।''

      ''अच्छा ! पहले मैं सुन्दर न थी ?''

      ''मैंने यह कब कहा ?''

      ''अच्छा बताओ, तुम्हें मेरी याद आती थी?'' हवा से चेहरे पर आए अपने बालों को हाथ से पीछे करते हुए रंजना ने पूछा।

      ''बहुत! मैं तो तुझे भूला ही नहीं।''

      ''अच्छा !'' इस बार रंजना की मुस्कराहट में उसके मोती जैसे दांतों का लिश्कारा भी शामिल था।

''तुमने दिल्ली वाली नौकरी की ऑफर क्यों ठुकराई ? यहाँ होती तो हम रोज मिला करते।''

''दरअसल मुझे दफ्तर की दिन भर की नौकरी से टीचर की नौकरी बहुत पसंद है। इसलिए जब अवसर मिला, वह भी केन्द्रीय विद्यालय का तो मैं उसे ठुकरा न सकी।''

तभी, ऑटो वाले ने करोलबाग के एक बाजार में ऑटो रोक दिया। हम उतर गए। ऑटो वाले को रंजना पैसे देने लगी तो मैंने रोक दिया। पैसे देकर हम दोनों बाजार में घूमने लगे। रंजना कई दुकानों के अन्दर गई। सामान उलट-पुलट कर देखती रही। कीमतें पूछती रही। भाव बनाती रही। उसे देखकर मुझे लगा, रंजना को शॉपिंग का अच्छा तजुर्बा हो जैसे। हमें बाजार में घूमते एक घंटे से ऊपर हो चुका था लेकिन रंजना ने अभी कुछ भी नहीं खरीदा था। मैंने पूछा, ''रंजना, तुझे लेना क्या है ?''

उसने मेरी ओर देखा और हल्का-सा मुस्करा दी। फिर, वह उसी दुकान में जा घुसी जहाँ हम सबसे पहले गए थे। वह कपड़ों की दुकान थी। काफी देर बाद उसने दो रेडीमेड सूट खरीदे। पैसे देने लगी तो मैंने उसे रोक दिया। थोड़ी न-नुकर के बाद वह मान गई। मैंने पैसे दिए और सूट वाले थैले पकड़ लिए। फिर वह एक और दुकान में गई और तुरन्त ही बाहर निकल आई। वह मुझे बाजू से पकड़कर खींचती हुई -सी आगे बढ़ी और एक दूसरी दुकान में जा घुसी। उसने दो साड़ियाँ पसंद कीं। इस बार उसने अपना बटुआ नहीं खोला। साड़ियाँ कीमती थीं, मैंने पैसे अदा किए और दुकान से बाहर आ गए। बाहर निकलकर वह बोली, ''शॉपिंग करना कोई आसान काम नहीं ।''

फिर वह फुटपाथ पर लगी दुकानों पर झुमके, बालियाँ और नेल-पालिश देखने लगी। पूरा बाजार घूम कर उसने दो-चार चीजें खरीदीं। मैंने घड़ी की तरफ देखा- दो बजने वाले थे।

''मनीष, मुझे जूती खरीदनी है।'' रंजना के कहने पर मैं उसे जूतियों वाले बाजार में ले गया। थैले उठाये मैं उसके पीछे-पीछे एक दुकान से दूसरी, दूसरी से तीसरी और तीसरी से चौथी दुकान घूमता रहा।

रंजना के संग घूमना हालाँकि मुझे अच्छा लग रहा था पर मैं एकांत में बैठकर उसके साथ बातें भी करना चाहता था। रंजना को लेकर जो स्वप्न मैंने देखे थे, उनके बारे में मैं उसे बताना चाहता था। मैंने सोचा था, रंजना घंटा, डेढ़-घंटा शॉपिंग करेगी, फिर हम किसी रेस्तरां में बैठकर लंच के साथ-साथ कुछ बातें भी शेयर करेंगे। समय मिला तो किसी पॉर्क में भी बैठेंगे। पर मेरी यह इच्छा पूरी होती नज़र नहीं आती थी।

रंजना तीन बजे तक सैंडिल ही पसंद करती रही। सैंडिल लेकर जब हम सड़क पर आए तो उसे जैसे एकाएक कुछ याद हो आया। वह रुक कर बोली, ''मनीष, एक चीज़ तो रह ही गई।''

''क्या ?'' सामान उठाये मैंने पूछा।

''छोटा सा अटैची या बैग लेना था।''

मैं कुछ न बोला। चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलने लगा।



मुझे जोरों की भूख लगी हुई थी। मैंने पूछा, ''रंजना, तुम्हें भूख नहीं लगी? कुछ खा लेते हैं कहीं बैठ कर।''

उसने पहली बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी की ओर देखा था और समय देखकर हड़बड़ा उठी।

''नहीं-नहीं, मनीष। देर हो जाएगी। साढ़े तीन बज रहे हैं। चार बजे की ट्रेन है। अब बस चलो यहाँ से।''

ऑटो कर जब हम स्टेशन पहुँचे चार बजने में दस मिनट रहते थे। उसने फटाफट लॉक-अप रूम से अपना अटैची लिया। रंजना ने छोटा छोटा सामान अपने हाथों में ले लिया था और बोली थी, ''जल्दी करो, मनीष। कहीं गाड़ी न छूट जाए।''

ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लगी हुई थी। सामान उठाये मैं रंजना के पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। मेरी साँस फूल रही थीं। एकबार मन हुआ, कुली को बुला लूँ। लेकिन दूसरे ही क्षण अपने इस इरादे को रद्द करके मैं रंजना के पीछ-पीछे चलता रहा। रंजना ने अपना कोच ढूँढ़ा। यह एक टू-टायर डिब्बा था। मैंने उसका सारा सामान उसकी सीट के नीचे और उसकी सीट पर रखा। वह रूमाल से अपने माथे का पसीना पोंछ रही थी। ट्रेन छूटने में कुछ मिनट ही बाकी थी।

मैं डिब्बे से नीचे उतरा और रंजना के लिए पानी की बोतल लेने दौड़ा। पानी की बोतल लेकर लौटा तो देखा- प्लेटफॉर्म पर खड़ा एक युवक खिड़की के पास बैठी रंजना से बातें कर रहा था। दोनों की पीठ मेरी ओर थी। मैं कुछ फासला बनाकर पीछे ही खड़ा हो गया। उन दोनों की बातें मुझे स्पष्ट सुनाई दे रही थीं।

''मुझे पहचाना ? मैं राकेश का दोस्त, कमल। राकेश जब आपके घर आपको देखने गया था, मैं उसके साथ था।''

''ओह आप !''

''मैं लखनऊ जा रहा हूँ। पिछले डिब्बे में मेरी सीट है। मैंने आपको डिब्बे में चढ़ते देख लिया था। आप किधर जा रही हैं ?''

''कानपुर।''

''कौन रहता है वहाँ ?''

''मेरी मौसी का घर है कानपुर में। उनकी बेटी का विवाह है। मेरे घरवाले बाद में आएँगे, मैं कुछ पहले जा रही हूँ।''

''वह कौन है जो आपके साथ आया है ?''

''वो... वो तो बड़े भाई साहब का कोई परिचित है। यहीं दिल्ली मेें नौकरी करता है। भाई साहब ने फोन कर दिया था। बेचारा सुबह से मेरे संग कुलियों की तरह घूम रहा है।''

मेरे अंदर जैसे कुछ कांच की तरह टूटा था। मैं तो अपनी दोस्ती को रिश्ते में बदलने के सपने देख रहा था और रंजना ने मुझे दोस्त के योग्य भी नहीं समझा।

सिगनल हो गया था। वह युवक अपने डिब्बे में चला गया था। मैंने आगे बढ़कर खिड़की से ही पानी की बोतल रंजना को थमाई और पूछा, ''कौन था ?''

''मेरे मंगेतर का दोस्त।'' रंजना ने मुस्कराते हुए बताया ही था कि ट्रेन आगे सरकने लगी। आगे बढ़ती गाड़ी के साथ-साथ मैं कुछ दूर तक दौड़ना चाहता था, पर न जाने मेरे पैरों को क्या हो गया था। वे जैसे प्लेटफॉर्म से ही चिपक गए थे। मैं जहाँ खड़ा था, वहीं खड़ा रह गया।

धीमे-धीमे गाड़ी रफ्तार पकड़ती गई। मेरे और रंजना के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा था। देखते देखते रंजना एक बिंदु में तबदील हो कर एकाएक गायब हो गई।

मैं भारी कदमों से स्टेशन से बाहर निकला। मुझे बेहद गरमी महसूस हुई। इस मौसम को न जाने अचानक क्या हो गया था। सवेरे तो अच्छा-भला और खुशनुमा था, पर अब आग बरसा रहा था। क्या वाकई मौसम गरम था या मेरे अंदर जो आग मच रही थी, यह उसका सेक था ?


******************* 




 
परिचय



सुभाष नीरव (वास्तविक नाम : सुभाष चन्द्र)

प्रकाशित कृतियाँ : तीन कहानी संग्रह(दैत्य तथा अन्य कहानियाँ, औरत होने का गुनाह, आख़िरी पड़ाव का दु:ख), दो कविता संग्रह(यत्किंचित व रोशनी की लकीर), एक लघुकथा संग्रह (सफ़र में आदमी), दो बाल कहानी संग्रह(‘मेहनत की रोटी’ और ‘सुनो कहानी राजा)। एक कहानी संग्रह पंजाबी में भी – ‘सुभाष नीरव दीआं चौणवियां कहाणियाँ’ 2014 में प्रकाशित। पंजाबी से दो दर्जन से अधिक पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद।

सम्मान : लघुकथा लेखन के लिए माता शरबती देवी स्मृति सम्मान, 1992, मंच पुरस्कार, 2000 तथा श्री बलदेव कौशिक स्मृति पुरस्कार, 2014 । कहानी ‘रंग बदलता मौसम’ पर राजस्थान पत्रिका द्वारा ‘सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार -2011

ब्लॉग्स : साहित्य और अनुवाद से संबंधित अंतर्जाल पर ब्लॉग्स- सेतु साहित्य, कथा पंजाब, सृजन यात्रा, गवाक्ष और वाटिका

सम्पर्क : आर ज़ैड एफ़ – 30ए, एफ़ ब्लॉक, वेस्ट सागर पुर, पंखा रोड,नई दिल्ली-110046

फोन : 09810534373, 08447252120

ई मेल % subhashneerav@gmail.com

Saturday, February 14, 2015

मणि मोहन मेहता की कवितायें







पिछले कुछ समय से लगातार मणि मोहन मेहता जी की कवितायें पढ़ रही हूँ!    एक सचेत कवि  के रूप में वे बहुत प्रभावित करते हैं!  उनके यहाँ प्रेम किसी भी प्रकार के आडम्बर से मुक्त, अपने सरल, सहज रूप में हौले से आपको छू लेता है!  आज जब प्रेम कविताओं ही नहीं जीवन से भी दुर्लभ होते जा रहा, ये कवितायेँ सुखद वासंती बयार सी ताज़गी लिए हुए हैं!  आज वैलेंटाइन डे के अवसर पर उनकी कुछ कविताएँ जिनमें छोटी प्रेम कवितायें शामिल हैं, यकीनन पढ़ी जानी चाहिए .....




जन्मदिन


मुझे पता है
अपने जन्मदिन पर
उसे क्या चाहिए

असंख्य संख्याओं से भरे
मेरे स्मृति कोष में
बनी रहे
यह एक छोटी सी तारीख़
और ऐन वक्त पर
किसी खरगोश की तरह उछलते हुए
निकल आये बाहर
और उसे चौंका दे ....

मुझे पता है
अपने जन्मदिन पर
उसे बस इतना चाहिए ।
(पत्नी के लिए)






एक छोटी सी प्रेम कविता

कुछ कहा मैंने
कुछ उसने सुना
फिर धीरे - धीरे
डूबती चली गई ...भाषा
साँसों के समंदर में -
हम देर तक
मनाते रहे जश्न
भाषा के डूबने का ।



प्रेम

अक्सर लौटता हूँ घर
धुल और पसीने से लथपथ
अपनी नाकामियों के साथ
थका - हारा

वह मुस्कराते हुए
एक कप चाय के साथ
सिर्फ थकान के बारे में पूछती है
और मैं भूल जाता हूँ
अपनी हार ।





 शरणार्थी शिविर

अपने सिर पर
बचे - खुचे अर्थ की
गठरी उठाये
कुछ शब्द आये

सहमते - सहमते
आया कुछ विस्थापित सौंदर्य
कुछ विस्थापित सत्य आये

कविता के शरणार्थी शिविर में
सब आये
कवि के पीछे - पीछे
भाषा के बीहड़ में ।



गौरैया

स्कूल गई है गौरैया
अभी घर में पसरा है सन्नाटा
पौने तीन बजे होगी छुट्टी
तीन बजे तक लौटेगी गौरैया

आते ही फेंकेगी अपने जूते
बारामदे में
और बस्ता
ड्राइंगरूम में
( कभी - कभार इसके ठीक उलट
बस्ता बारामदे में
और जूते ड्राइंगरूम में )

कैसा रहा स्कूल ? पूछेगी उसकी माँ ...
तिरछी नज़रों से देखेगी
अपनी माँ को
फिर झटकेगी अपने पंखों से
मरे हुए शब्दों की धूल
और मुस्करायेगी ....

और फिर
चहक उठेगा पूरा घर
बस आती होगी गौरैया ।


 छुटकी

आठ साल की छुटकी
अपने से दस साल बड़े
अपने भाई के साथ
बराबरी से झगड़ रही है

छीना-झपटी
खींचा-खांची
नोचा -नाचीं
यहाँ तक की मारा -पीटी भी

उसकी माँ नाराज है
इस नकचढ़ी छुटकी से
बराबरी से जो लडती है
अपने भाई के साथ

वह मुझसे भी नाराज है
सर चढ़ा रखा है मैंने उसे
मैं ही बना रहा हूँ उसे लड़ाकू

शायद समझती नहीं
कि ज़िन्दगी के घने बीहड़ से होकर
गुजरना है उसे

इस वक्त
खेल- खेल में जो सीख लेगी
थोड़ा बहुत लड़ना भिड़ना
ज़िन्दगी भर उसके काम आयेगा  ।



थोड़ी सी भाषा

बच्चों से बतियाते हुए
अंदर बची रह जाती है
थोड़ी - सी भाषा
बची रह जाती है
थोड़ी - सी भाषा
प्रार्थना के बाद भी ।

थोड़ी - सी भाषा
बच ही जाती है
अपने अंतरंग मित्र को
दुखड़ा सुनाने के बाद भी ।

किसी को विदा करते वक़्त
जब अचानक आ जाती है
प्लेटफॉर्म पर धड़धड़ाती हुई ट्रेन
तो शोर में बिखर जाती है
थोड़ी - सी भाषा ...
चली जाती है थोड़ी - सी भाषा
किसी के साथ
फिर भी बची रह जाती है
थोड़ी - सी भाषा
घर के लिए ।

जब भी कुछ कहने की कोशिश करता हूँ
वह रख देती है
अपने थरथराते होंठ
मेरे होंठो पर
थोड़ी - सी भाषा
फिर बची रह जाती है ।

दिन भर बोलता रहता हूँ
कुछ न कुछ
फिर भी बचा रहता है
बहुत कुछ  अनकहा
बची रहती है
थोड़ी - सी भाषा
इस तरह  ।

अब देखो न !
कहाँ - कहाँ से
कैसे - कैसे बचाकर लाया हूँ
थोड़ी - सी भाषा
कविता के लिए ।


कविता

बस जाने ही वाला था
नींद के आग़ोश में
कि अचानक
जेहन में चमकती है
कविता की एक पंक्ति ....
रोशनी से भर जाता है जेहन
रोशनी में नहा जाती है नींद
और सपने तरबतर हो जाते हैं
रोशनी से ....
लफ़्ज़ों का दरिया
बहाए लिए जाता है मुझे
किसी सुबह की चट्टान पर
पटकने को बेताब ।

 ************

परिचय 

जन्म  : 02 मई 1967 ,
           सिरोंज (विदिशा) म. प्र.

शिक्षा : अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर
            और शोध उपाधि

प्रकाशन : देश की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्र - पत्रिकाओं ( पहल , वसुधा , अक्षर पर्व ,  समावर्तन , नया पथ , वागर्थ , बया , आदि ) में कवितायेँ तथा अनुवाद प्रकाशित ।
वर्ष 2003 में म. प्र. साहित्य अकादमी के सहयोग से कविता संग्रह ' कस्बे का कवि एवं अन्य कवितायेँ ' प्रकाशित ।वर्ष 2012 में रोमेनियन कवि मारिन सोरेसक्यू की कविताओं की अनुवाद पुस्तक  ' एक सीढ़ी आकाश के लिए ' उद्भावना से प्रकाशित ।वर्ष 2013 में अंतिका से कविता संग्रह  " शायद " प्रकाशित ।इसी संग्रह पर म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा वागीश्वरी पुरस्कार।  कुछ कवितायेँ उर्दू , मराठी और पंजाबी में अनूदित ।


Thursday, February 12, 2015

निरुपमा सिनहा की कवितायें








निरुपमा सिनहा की प्रेम कवितायें हम फेसबुक पर पढ़ते रहे हैं!  चाँद उनका प्रिय विषय रहा है!  चाँद पर लिखी उनकी कई कविताओं और साझा की गईं पंक्तियों से बनी 'सुन्दर प्रेम कविताओं की कवयित्री' की छवि से ठीक इतर,  पिछले कई महीनों से नवसम में गोष्ठियों में सुनीं उनकी कविताओं ने एक संकोची किन्तु विचार प्रधान लेखिका से मिलने का अवसर दिया!  उन्हीं के शब्दों में, " बचपन में एक निर्जीव पड़े पौधे को मिट्टी में रोपते वक्त मन में यह विश्वास जगा था कि इसमें जीवन ज़रूर पनपेगा!  इसी आशा ने मेरे लेखन को शब्द दिए और मेरी पहली लघु कहानी लखनऊ आकाशवाणी से "बालसभा " कार्यक्रम में प्रसारित हुई!  आकाशवाणी गोरखपुर से भी कहानी और हास्य-व्यंग्य का प्रसारण हुआ!"  तो आज उनकी कुछ कवितायें स्वयंसिद्धा के पाठकों के लिए.……










(1)


चींटियाँ

मेरे आसपास
टहलती हैं
चींटियाँ
भूरी
लाल
और
काली ..
भूरी ...
कितनी मिलती है
विपत्तियों से
हमें डरा धमका
दबे पाँव
निकल जाती हैं
अहसास दिला
कि
निश्चिन्त न होना ..
लाल ...
चिपट काया से
निकाल लेती है
अंदर की चीखें
जिसे हमने
वर्जनाओं में लपेट रखा था
सहनशक्ति के नाम पर ...
.काली...
को
हमेशा जल्दी होती है
गन्तव्य तक
पहुँचने की
निगरानी कर
हमारी भावनावों की
चल देती चंचल सी
उन कन्दरावों में
जहाँ हमने भी
सहेजे होते हैं
सफेद ..उजले ..भविष्य
उसके अण्डों की तरह !!


(2)
तुलना


निर्बाध बहती
अपने लक्ष्य को
साधती
किसी बंधन को
नहीं मानती
कभी धीमी
कभी तेज़
छलक कर
छलका कर
अपनी चंचलता से
भिगो जाती
बिना
यह सोचे कि
बुरा लगेगा
या भला
स्वीकारती
जीवन की खुशियों को
आमन्त्रण
पा सागर का
दौड़ जाती
अबाध !!
.
..............मैं नदी !!!
खुश नहीं हूँ
यह जानकर
कि
मेरी तुलना की जाती है
स्त्री से !!







(3)
अधखुले पन्ने का सच !!


इधर से उधर
छिपता हुआ बच्चा
घर की चाहरदीवारों के बीच
सहमा सा
पिता की शोर करती
आवाज़
से
कान को ढापे हुए

इस इंतजार में
कि कब निकले
पिता घर से
और
घर उसका हो जाए

सबसे नागवार गुजरता था
उनका माँ पर चिल्लाना
दिनभर मकान को
घर बनाते
थकती थी
माँ की हिम्मत
पर नहीं हारते थे
" पिता "
अपनी आदतों से .
मन -मन तसल्ली करता था
वो मासूम सा बचपन
बड़ा होकर
नहीं चलेगा इन पदचापों पर

समय ने
छोटे से बड़ा
बड़ा से
जवान कर दिया
उसके दालान और आँगन में
दीखता हैं बचपन
पर नहीं दिखता कोई
मासूम
दौड़ कर उससे लिपटता हुआ
और
.... " पापा " प्यार से कहते हुए
न जाने
कब और कैसे
वो भी चल चुका होता है
पिता की राह पर
उसकी ऊँची आवाज़े जा टकराती है
बंद दिशाओं में
पत्नी की आँचल में
सुबकते बच्चे
आज भी करते हैं इंतजार
कि
कब हो पापा बाहर
और हम
अपने होने का उत्सव मनाये !!


(4)
मौसम


मंडराती हैं
आसपास
तमाम मधुमक्खियाँ
पैरों में
हाथों में
चेहरों पर
यहाँ तक की
दिल पर भी
ऊभरे थे
अनेक
डंक के निशाँ
उसने सीखा नहीं
स्वभाव का गेंद बन जाना
लौटा नहीं पाती थी
कोई भी दंश
.एकत्र करती जाती थी
सब कुछ
समय के अंतराल पर
आ जाते थे
व्यापारी
बटोर ले जाने
"शहद "
..
वसंत आ रहा है घबरा रहा है
उसका मन
मौसम फूलों का
बढ़ा न दे उसका दर्द






(5) 
स्मृतियाँ


मिस्र की पिरामिडों में
रखी लाशों की तरह
पूरे ज़िस्म में
सुरक्षित हैं
लेप लगाये हुए
स्मृतियाँ

संरक्षण की खोज ही
शायद
हुई होगी
इन्हीं स्मृतियों के
खो जाने के भय से

पिरामिडों के ठीक पीछे
दफ़न है
इन्हें पुनः जीवित कर देने का रहस्य

लेकिन
कोई उस कला को
सीखना नहीं चाहता
अच्छी लगती है
सबको शांत .....नीद में लेटी
मूक स्मृतियाँ
आवश्यकतानुसार
धीरे - धीरे
खुद की ओर से
खुले हुए दरवाजों से
प्रवेश करना
जहाँ से दूसरे का
दखल बंद हो !!


(6)
अधपका


मन की आँच
तन की हांडी
पकते रहे
विचारों के चावल
चैतन्यता बीच बीच में
उचकाती रही कंधे शब्दों पर
...नमक
जैसे वाक्य विन्यास पर
जाँचता रहा अर्थप्रवाह ....

किसी चीज़ का
ठीक से पक जाना ही
स्वाद की विश्वसनीयता है
यही सोच
खदबदाती रही
वाक्यों का संयोजन
निश्चिंतता के व्याकरण पर
ज्यूँ ही उतारा अपना अंतर्मन ..
..नीचे की परत पर थी
कालिमा का वर्चस्व
भूल गई थी
स्त्रियाँ !!
रचती नही कविता
..उन्हें रचना होता है परिवार .
................. जहाँ कभी कुछ अधपका नही रहता
सिवाय मन के !!

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परिचय

निरुपमा सिनहा
जन्म - 23अक्टूबर
स्थान - बस्ती (उ.प्र )
शिक्षा - एम .ए (हिंदी ) बी. एड
निवास स्थान - इन्द्रापुरम गाज़ियाबाद

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कवितायेँ प्रकाशित!
हिंदी युग्म से प्रकाशित पुस्तक बालार्क में कविताएँ और कलकता के "प्रभात चेतना " में प्रकाशित कविता .
लखनऊ आकाशवाणी द्वारा पत्र -लेखन में पुरस्कार!


(उपरोक्त चित्र गूगल से लिए गए हैं)