Thursday, January 22, 2015

सरोज सिंह की कवितायें

Tuesday, January 20, 2015

मजनूं का टीला से जगमोहन साहनी - 2


 जगमोहन साहनी फेसबुक पर काफी सक्रिय हैं!  वे दिल्ली में रहते हैं और व्यवसाय करते हैं!  फ़िल्मी दुनिया और संगीत के दीवाने हैं!  संभव है रेडियो पर फरमाइशी  गीतों के कार्यक्रम में आपने कई बार सुना  हो "…और मजनूं का टीला से जगमोहन साहनी"!    पुराने फ़िल्मी रोचक  किस्सों में उनकी दिलचस्पी उन्हें और बहुत से पाठकों को जोड़ती है!  इन दिनों साहनी जी 92.7 बिग ऍफ़ एम (कार्यक्रम : सुहाना सफर विद अन्नू कपूर) पर सुनाये जाने वाले किस्सों- कहानियों को फेसबुक पर प्रस्तुत कर रहे हैं!  ऍफ़ एम से नोट कर उन्हें टाइप करने और फिर पोस्ट से सम्बंधित तस्वीरें ढूंढकर लगाने में कितना भी वक़्त लगे पर जगमोहन जी ये रोचक तथ्य परोसने में खासी ख़ुशी महसूस करते हैं!  ऐसे ही कुछ किस्से स्वयंसिद्धा पर भी लगाने जा रही हूँ!  पढ़िए और जानिए फ़िल्मी दुनिया के छोटे-छोटे, छुपे-जाहिर किस्से!  आज का किस्सा ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी  के जीवन से जुड़ा है.……




ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी की आखिरी ट्रेजेडी

1972 में मीना कुमारी की हालत बहुत ही खराब हो चुकी थी!  ज्यादा शराब पीने की आदत से मीना कुमारी जी का लीवर खराब हो चुका था!  उनका इलाज घर पर ही डा.शाह की देखरेख में चल रहा था!  डॉ शाह उन्हें रोज घर पर देखने आते थे!  हाथ- पैरो में सूजन की वजह से वह बैड से उठ भी नहीं पाती थी!  दिनों-दिन उनकी हालत खराब होती जा रही थी उनकी यह हालत देखकर डॉ शाह ने उन्हें हास्पिटल में  दाखिल करने की सलाह दी!  डा. शाह की बात मानते हुए मीना कुमारी की दोनों बहनों ने उन्हें हॉस्पिटल ले जाने का इंतजाम शुरू कर दिया!  




मीना कुमारी को अंदेशा था कि हॉस्पिटल के खर्चे के लिए घर मे पैसे नहीं होंगे!  उन्होंने अपनी बड़ी बहन खुर्शीद से पूछा कि "कुछ बचा है?"   खुर्शीद बोली,  "सिर्फ सौ रुपए है!"   बहन ने कहा कि कमाल अमरोही से पैसे ले लेते हैं!  इस पर मीना कुमारी ने साफ मना कर दिया और बोलीं,  "निर्माता निर्देशक प्रेम जी को फोन करो!  मैंने  उनकी एक फिल्म में काम किया था!  उसका कुछ पैसा बकाया है!"   रकम तकरीबन दस हजार रुपये थी! जो प्रेम जी तुरंत लौटा दिए!  मीना कुमारी  को अंदेशा था कि वह अब हॉस्पिटल से लौटेगी नहीं  इसलिए हॉस्पिटल जाने से पहले उन्होंने सबको अलविदा कहा और अपने मालाबार हिल के घर से निकल पड़ी एलिजाबेथ नर्सिग होम में भर्ती होने के लिए!


काफी मुश्किलें, दर्द और तकलीफों के बाद 31 मार्च सन 1972 को मीना कुमारी इस दुनिया से रुखसत हो गई! उनके आखिरी समय में उनकी दोनों बहनों खुर्शीद, मधु  के अलावा उनके पति कमाल अमरोही, गुलजार, नादिरा, सायरा बानो, श्यामा मौजूद थीं!  नर्सिग होम में ही कमाल अमरोही और मीना कुमारी की बहनों में  बहस छिड गई कि उन्हें कहाँ दफनाया जाए!  बहनें  कहने लगी कि मीना कुमारी को बांद्रा के सुन्नी कब्रिस्तान मे दफनाया जाए जहाँ उनके मां-बाबूजी को दफनाया गया था!  इधर कमाल अमरोही कह रहे थे कि मीना कुमारी ने मुझसे कहा था कि उन्हें अमरोहा में दफनाया जाए! 


और असली ड्रामा तो तब हुआ जब नर्सिग होम वालों ने डेडबाडी देने से इनकार कर दिया!  क्यों?  क्योंकि उनका तीन हजार पांच सौ रुपये का बिल बकाया था! मीना कुमारी की बायोग्राफी में इस घटना का जिक्र करते हुए राइटर ने लिखा है कि  अचरज की बात यह है कि इतने सारे लोग मौजूद होने के बावजूद किसी ने इस बिल को देने की जहमत नहीं उठाई!  बाद में मीना कुमारी जी का इलाज कर रहे डॉक्टर शाह ने अपनी पत्नी को फोन किया और कहा कि आप फौरन रकम लेकर यहां पहुंचो!  तब जाकर मीना कुमारी  का पार्थिव शरीर नर्सिंग  होम से घर लाया गया और आखिरी रस्मों  को पूरा कर, ना तो बांद्रा के कब्रिस्तान और ना ही अमरोहा बल्कि इस महान अदाकारा को मुंबई के मडगांव के रहमत बाग के शिया कब्रिस्तान मे दफनाया गया !

 
"तुम क्या करोगे सुन कर मेरी कहानी,  बेनूर जिदंगी के किस्से है फीके फीके!"
 

तो दोस्तों यह थी महान अदाकारा मीना कुमारी जी आखिरी दिनों की मार्मिक कहानी, आपको कैसी लगी अपनी राय देना ना भूलना---


(सौजन्य :- 92.7 बिग F.M. सुहाना सफर विद अन्नू कपूर ) 

---जगमोहन साहनी 
मजनूं का टीला 


(चित्र सौजन्य : जगमोहन साहनी)

Monday, January 19, 2015

मजनूं का टीला से जगमोहन साहनी -1

 जगमोहन साहनी फेसबुक पर काफी सक्रिय हैं!  वे दिल्ली में रहते हैं और व्यवसाय करते हैं!  फ़िल्मी दुनिया और संगीत के दीवाने हैं!  संभव है रेडियो पर फरमाइशी  गीतों के कार्यक्रम में आपने कई बार सुना  हो "…और मजनूं का टीला से जगमोहन साहनी"!    पुराने फ़िल्मी रोचक  किस्सों में उनकी दिलचस्पी उन्हें और बहुत से पाठकों को जोड़ती है!  इन दिनों साहनी जी 92.7 बिग ऍफ़ एम (कार्यक्रम : सुहाना सफर विद अन्नू कपूर) पर सुनाये जाने वाले किस्सों- कहानियों को फेसबुक पर प्रस्तुत कर रहे हैं!  ऍफ़ एम से नोट कर उन्हें टाइप करने और फिर पोस्ट से सम्बंधित तस्वीरें ढूंढकर लगाने में कितना भी वक़्त लगे पर जगमोहन जी ये रोचक तथ्य परोसने में खासी ख़ुशी महसूस करते हैं!  ऐसे ही कुछ किस्से स्वयंसिद्धा पर भी लगाने जा रही हूँ!  पढ़िए और जानिए फ़िल्मी दुनिया के छोटे-छोटे, छुपे-जाहिर किस्से……








आज बात एक ऐसे संगीतकार की जिनकी धुनों ने हमें दीवाना बनाया!  जिनके गीत शौहरत की बुलंदियों पर रहे लेकिन उनकी जिंदगी मुफ़लिसी व फकीरी में  गुजरी!  जी,  मै बात कर रहा हूं म्यूजिक डायरेक्टर जयदेव जी की, जिन्होंने संगीत को सिर्फ साधना समझा और बड़ी ही खामोशी के साथ अपना काम करते हुए बिना पब्लिसिटी, बिना विवाद, बिना पैसों का लालच दिखाए अपना काम करते रहे!  इन्होंने कभी शादी नहीं की और ना ही बहुत पैसे कमाए!  जो मिला रख लिया,  नहीं मिला जाने दिया!  यही वजह थी कि वह अपना मकान नहीं खरीद पाए और सारी जिंदगी किराए के मकान में गुजार दी!  घर  में ऐशोआराम का कोई समान नहीं था!  थोड़े  से बर्तन, बिस्तर, चूल्हा-चौका!  वह पानी भी मिट्टी के बर्तन में पीते थे और फर्श पर ही चटाई बिछा कर सो जाया करते थे!  जयदेव जी ने पूरी जिंदगी फकीरों जैसी गुजार दी थी!






 38 फिल्मों में लाजवाब संगीत देने वाले जयदेव पहले ऐसे संगीतकार थे जिन्हें तीन नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया!  1972 में फिल्म" रेशमा और शेरा",  1979 में  फिल्म "गमन" के लिए और  1985 में  फिल्म "अनकही" के लिए!   इनकी प्रमुख फिल्मों में "हम दोनों" "मुझे जीने दो" "किनारे किनारे" इत्यादि रहीं!  हरिवंशराय बच्चन की 'मधुशाला' जो कि मन्ना डे ने गाई उसका संगीत भी जयदेव जी ने दिया था ! 6 जनवरी 1987 को यह महान कलाकार जब इस दुनिया से विदा हुआ तो संपति के नाम पर कुछ रोजमर्रा की चीजों के अलावा एक हारमोनियम मिला जिस पर जयदेव जी अनमोल संगीत रचा करते थे!  इस गरीबी के बाद भी उनके जानने वाले बताते हैं कि जयदेव जी के चेहरे पर कभी कोई शिकन कोई परेशानी नहीं देखी! वह हमेशा बहुत शांत रहा करते थे! उन्होंनें कभी पैसों का मोह नहीं किया! 
 

हमारी तरफ से जयदेव जी को भावभीनी श्रद्धांजलि 

(सौजन्य 92.7 F. M. सुहाना सफर विद अन्नू कपूर)
जगमोहन साहनी
मजनूं का टीला



(चित्र सौजन्य : जगमोहन साहनी)



Friday, October 10, 2014

अगर इच्छाओं के पंख होते (कहानी) : अचला बंसल



एक आयोजन में वरिष्ठ कहानीकार अचला जी से परिचय कराते हुए मित्र आकांक्षा पारे ने इस कहानी का जिक्र किया।  उनका कहना था कि इस कहानी को पढ़ना बेहद जरूरी है।  तभी से इस कहानी को पढ़ने की इच्छा जागी जो गुजरते समय के साथ तीव्र होती गई।  पिछले दिनों आकांक्षा के सौजन्य से 'रचनाकार' में इस कहानी का प्रियदर्शन जी द्वारा किया बेहतरीन हिन्दी अनुवाद पढ़ने को मिला तो लगा आकांक्षा का कहा लेशमात्र भी अतिशयोक्ति नहीं था।  यकीनन इस कहानी को पढ़ा जाना जरूरी है।  आप भी पढ़ेंगे तो जरूर सहमत होंगे.....






राहुल को अपनी पीठ झुलसती हुई महसूस हो रही थी। उस झुर्रियाए, सख्त चेहरे की डूबी आंखों में इतना तीखापन था कि उसकी हिम्मत नहीं हुई कि मुड़ कर उनका सामना करे,कहीं उनकी लपट उसे लील न जाएं।

वे क्या चाहती थीं? क्यों उनकी आंखें लगातार उसका पीछा करती रहती थीं- बेरहमी से, ख़ामोशी से। नहीं वे ख़ामोश नहीं थीं। सिर्फ होंठ चुप थे, आंखें नहीं। वे याचना कर रही थीं, चुनौती दे रही थीं, आरोप लगा रही थीं। किस बात का? क्या किया है उसने? या क्या नहीं किया है? जैसे ही उसे अपनी घबराई पत्नी विभा का फ़ोन आया, वह ज़रूरी मीटिंग छोड़कर, उन्हें डॉक्टर को ले कर घर चला आया था। उनकी ‘उच्च ज़िंदगी’ से परिचित डॉक्टर ने- भले ही वे सब उसके आउटडेटेड होने को लेकर उसक मज़ाक बनाते थे-उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह दी थी। वह तैयार हो गया था, कुछ ज़्यादा ही व्यग्रता से। डॉक्टर ने उस पर एक तीखी निगाह डाल कर कहा था,‘आपको फिर भी उनका ख़याल रखना होगा। नर्सें सबकुछ नहीं कर सकतीं।‘

‘हां, हां, विभा छुट्टी ले सकती है...हम दोनों मिलकर मैनेज कर लेंगे,’ उसने डॉक्टर की चुभती निगाहों से बचते हुए जल्दी से कहा था।

लेकिन उन्होंने मना कर दिया था। लाख मान-मनुहार के बाद भी तैयार नहीं हुई थीं। उसकी सीधी-सादी मां, जिसे वह बचपन से जानता था, उसके दबंग पिता के सामने हमेशा घुटने टेक देती थीं, कब उनके भीतर जिद्दीपन की यह टेक पैदा हो गई? वह हमेशा उसकी बात सुना करती थीं, उससे कुछ डरती भी थी, क्योंकि उनके मुताबिक, वह, अपने पापा जैसा ही था। अक्सर वे उसकी पत्नी को चेतावनी देती थीं कि उसे उकसाया न करे, लेकिन वह हंस कर उड़ा देती थी। ‘चिंता मत कीजिए मांजी, मेरा मिज़ाज भी इतना ही तेज़ है,’ विभा पलट कर कहती थी। वाकई था, लेकिन मां? क्या वह होश खो बैठी हैं कि उसकी इच्छा, उसका आदेश मानने से इनकार कर रही हैं?

आख़िर उसे मुड़ कर उनकी जलती आंखों का सामना करना पड़ा। उनके बगल में बैठकर, उसने उनके बर्फ जैसे उजले बाल सहलाए, ‘मां, तुम्हें अस्पताल जाना होगा। मैं कह रहा हूं न...डॉक्टर कहता है...’।

‘नहीं,’ वे बुदबुदाईं।

’नहीं का मतलब?’ उसने झल्ला कर पूछा।

‘मैं नहीं जाऊंगी। मैं यहीं मरूंगी।‘

’तुम मर नहीं रही हो, यहाँ पड़ी नहीं रही तो नहीं मरोगी।‘

’मैं मर रही हूं, लेकिन उसके पहले मैं उड़ूंगी, ऊपर बादलों में।‘

बहुत देर हो गई, उसने हताशा से सोचा, उन्हें अस्पताल पहले भर्ती करवाना चाहिए था।

उनका अंत आ चुका था। आख़िरकार वे काफी बूढ़ी थीं। ७० पार। उनकी सही उम्र उसे मालूम नहीं थी। पिता जीवित होते तो शायद उन्हैं पता होता मगर उसमें संदेह था।शायद ही वे अपनी आज्ञाकारी और घरेलू पत्नी के बारे में कुछ जानते थे।

’जाओ, दो टिकट ले आओ,वे बुदबुदाईं।

‘क्या?’अपनी बेसब्री पर क़ाबू रखने की कोशिश करते हुए उसने पूछा। काश वह अस्पताल जाने को तैयार हो जाएं। वह उनके लिए २४ घंटे की नर्सों का इंतज़ाम कर देगा। वह पैसा खर्च कर सकता था। पर समय? समय कहीं ज़्यादा क़ीमती था। काश विभा समझ पाती। लेकिन वह आपसी बराबरी में यक़ीन करती थी। उसके पास भी हासिल करने को मक़सद थे, पूरे करने को वादे थे। उसके बावजूद वह घर की देखरेख करती थी। उसके घर पर न रहने पर भी घर नियम से चलता था न। कम से कम वह अपनी मां का ख़याल तो रख सकता था। ‘आख़िरकार यह तुम्हारी ज़िम्मेवारी हैं,‘ उसने दो टूक कहा, और उसे उनकी बड़बड़ाहट सुनने को छोड़ गई।

‘विमान के दो टिकट ले आओ। मरने से पहले... मैं एक बार उड़ना चाहती हूं।‘

’लेकिन तुम कहीं नहीं जा सकती। अभी नहीं। जब ठीक हो जाओगी तो मैं तुम्हें ले जाऊंगा। अगर तुम अस्पताल जाने को राज़ी हो गईं तो मैं वादा करता हूं, जैसे ही लौटोगी, मैं तुम्हें ले जाऊंगा।

‘अगर मैं कहीं जाऊंगी तो प्लेन में, यह मेरी आख़िरी इच्छा है।‘

बेबस राहुल उन्हें तकता रहा, वह भी उसे घूरती रहीं, उनकी आंखें उसे भेद रही थीं, होंठ सख्ती से कसे थे। वह जानता था, अब वे नहीं बोलेंगी। जब से उसने उन्हें जाना है, चुप्पी उनका इकलौता हथियार रहा है। कोई उससे लोहा नहीं ले सकता था। उसके पिता भी नहीं।

क्या वह...नहीं वह पागलपन होगा। इस हाल में उन्हें कहीं नहीं ले जाया जा सकता। वे रास्ते में मर जाएंगी। वह इस खयाल से सिहर गया कि उसके हाथों में एक शव होगा, कितना अभद्र दिखेगा। वह, जिसने अब तक खूबसूरत एयरहोस्टेज़ेज की आंखों में अपने लिए तारीफ़ के अलावा कुछ नहीं देखा था। इस उम्र में भी, अपने उड़ते बालों और हल्की उभरी तोंद के बावजूद, वह मर्दानगी की मिसाल था। उसे औरतों को ख़ुश रखने का राज़ जो मालूम था। नई पीढ़ी, स्त्रियों से शिष्ट व्यवहार के आकर्षण के बारे में नहीं जानती।  वह ख़ुद उसमें भरपूर यक़ीन रखता था और उसके इस्तेमाल में पारंगत था। इस हद तक कि उसकी आज़ाद ख़याल पत्नी भी झल्ला जाती थी। वह अंदाज़ और अदाएं थकाने वाली  ज़रूर थीं पर आख़िर हर चीज़ की क़ीमत अदा करनी पड़ती है न। तारीफ़ का ईनाम भी तो मिलता है।

उसने गहरी सांस ली। काश अपनी सनक के बारे में उन्होंने पहले बतलाया होता। पर क्या सचमुच उसे मालूम नहीं था? जब वह छोटा था, वे ऊपर से गुजरते हवाई जहाज़ को तब तक देखती रहती थीं जब तक वह दूर आसमान में लक़ीर न बन जाता। तब भी मोहपाश में बंधी वे उसे ताकती रहती।

उसे धुंधला सा याद था कि वे टैरेस पर खड़े होकर ऊपर देखती रहती थीं। उसने कभी पूछने की ज़रूरत नहीं समझी कि वे क्या देख रही थीं। वह उनकी पुरानी आदत थी, वह बचपन से उसका अभ्यस्त था। जब भी वह विमान से सफ़र करता, वह ‘बेवकूफ़ाना’ सवाल किया करतीं, जिसके जवाब देने का न उसके पास वक्त था, न सब्र। "तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे मैं चांद से हो कर आया हूं," वह एक बार फट पड़ा था। उन्होंने दुबारा उससे नहीं पूछा था पर उनकी आंखें उसका तब तक पीछा करती रहतीं, जब तक वह अपने कमरे में शरण नहीं ले लेता, जहां उसे मालूम था, वे नहीं आएंगी।

उसने उन्हें सख्ती से देखा। आंखें अब भी उसी पर टिकी थीं। तीखी, झुलसाती हुईं। वह कमरे से बाहर निकल गया।

दरवाज़े पर खड़े हो कर उसने कहा, ‘मां, मैं दफ़्तर जा रहा हूं। अगर किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो घण्टी दबा देना। रामदीन यहां है। मैं तुम्हारे लिए एक नर्स का इंतज़ाम कर दूंगा।‘ उनकी ओर देखे बिना, वह बाहर निकल गया।



‘गुड मॉर्निंग सर’, जैसे ही वह अपनी कुर्सी पर बैठा, हाथ में भाप फेंकती कॉफी का कप लिये, उसकी ख़ूबसूरत सेक्रेटरी दाखिल हुई।सावधानी से उसे उसके सामने रख दिया। ‘थैंक्यू’, उसकी ओर देखे बिना वह बुदबुदाया। कुछ हैरान, वह एक लम्हे के लिए खड़ी रही, फिर चुपचाप चली गई। वह खिसिया कर मुस्कुराया, उसे अहसास था, वह अपनी मशहूर मुस्कान उसकी तरफ़ फेंकने से चूक गया था। इतना अभद्र व्यवहार?

उसने सुरुचि से सजे कमरे को देखा। खुला, आरामदेह। घर के उसके कमरे की तरह नहीं, जिसे उसकी पत्नी जब-तब ‘सजाने’ में लगी रहती है और जिससे उसे झल्लाहट होती है।



उसे तभी समझ जाना चाहिए था कि वह किस चक्कर में पड़ने वाला है, जब उसकी  होने वाली पत्नी ने गर्व के साथ बतलाया था कि उसने इंटीरियर डिज़ाइनिंग की है। वह गर्व से चहकती अपनी होने वाली पत्नी को देख कर लगाव से मुस्कुराया था। हर किसी के शौक होते हैं। उसकी मां के भी हैं। क्या वाकई? खाना पकाना, सीना-बुनना, क्या वे शौक थे? या ऐसे काम, जिन्हें वह आदतन- भले उनकी जरूरत न रह गई हो- मशीनी ढंग से करती रहती थीं? क्या उन्हें उनमें लुत्फ़ आता था? जब वह छोटा था, तभी उसने उनके असल रोमांच को महसूस कर लिया था...अनुभव तब किया, जब अपनी पहली हवाई ट्रिप पर गया। बादलों के पार...।

उसने फाइल बंद कर दी। काम में ध्यान लगाना असंभव हो गया था। पहले कभी उसका मन इस तरह नहीं भटका। वह धुन का पक्का और कामकाजी आदमी था। वह उठ गया।

‘वह डेढ़ बजे गॉल्फ़ क्लब में है, सर.’उसकी सेक्रेटरी उसके सामने खड़ी थी।

‘क्या?’

’मिस्टर रॉय के साथ लंच’।

‘कैंसिल कर दो।‘

’लेकिन सर...’

उसने ब्रीफ़केस उठाया तो वह उसे ताकती रह गई।

’मैं वापस नहीं आऊंगा,‘ कह, उसके कुछ समझ पाने से पहले वह बाहर निकल गया।



‘कहां चले गए थे तुम?’ जैसे ही घर में दाखिल हुआ, विभा ने पूछा। "रामदीन ने तुमसे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन तुम दफ़्तर में नहीं थे। फिर उसने मुझे फोन किया और मुझे दौड़ कर घर आना पड़ा। तुम उनके साथ एक दिन रह नहीं सकते थे? वह मर रही हैं और...।‘

वह उसे पीछे छोड़ दौड़ता हुआ मां के कमरे में पहुँचा।उनकी बंद आंखें देख उसका दिल बैठ गया। क्या वे मर गईं? उसने उनकी नब्ज़ देखी। नब्ज चल रही थी पर कुछ मद्धिम। उन्हें करना ही होगा। ज़्यादा वक्त नहीं था। उसे जल्दी करनी होगी।

‘मां,’ वह फुसफुसाया।

उनकी आंखें खुल गईं, ‘टिकट ले आए?’

’वे अनर्गल बड़बड़ा रही हैं,’ विभा दरवाज़े पर खड़ी थी।

’मां, तुम्हें मेरे साथ चलना होगा।’

वे ना में सिर हिलाने लगीं।

‘तुम पछताओगी नहीं’, वह उनके कानों में फुसफुसाया, "अपने तमाम ऊनी कपड़े रख लो। बाहर बहुत ठंड है। चल पाओगी न? मैं तुम्हें उठाकर ले चलूंगा।‘

’मैं चल सकती हूं,’ उन्होंने दृढ़ता से कहा। ‘लेकिन...’

’रास्ते में बतलाऊंगा। अगर तुम्हें ठीक नहीं लगा तो हम लौट आएंगे। मैं वादा करता हूं।‘उन्हें अपनी तरफ संदेह से देखते पा कर उसने जोड़ा।

’उनकी कुछ चीज़ें पैक कर दो।‘उसने विभा से कहा। ‘बस, ज़रूरत भर सामान।‘

’तुम उन्हें कहां ले जा रहे हो? कौन से अस्पताल? मैं चलूं साथ?’

’नहीं, मैं रहूंगा उनके साथ। बाद में तुम्हें बतला दूंगा, हम कहां हैं।‘

कुछ राहत महसूस करते हुए कि उसे साथ चलने को नहीं कह रहा, वह पैकिंग में जुट गई। उसे अस्पतालों से घिन्न आती थी...ऐंटीसेप्टिक की गंध, घिनौने मरीज़, सपाट चेहरे वाली नर्सें, डिटर्जेंट की गंध, सबसे।

‘टैक्सी के लिए फोन कर दो,‘अपने सामान एक ओवरनाइटर में ठूंसते हुए उसने हड़बड़ा कर कहा।

‘मैं तुम्हें छोड़ दूंगी,’ कुछ अपराधबोध अनुभव करते हुए उसने कहा।

’नहीं, नहीं, हम कैब ले लेंगे। जल्दी पहुंच जाएंगे।" उसने अविश्वास से उसे देखा तो उसने जोड़ा," मैं नहीं चाहता, तुम तेज़ ड्राइव करो।"

कंधे झटक कर उसने रिसीवर उठा लिया।



उन्हें घर छोड़े चार दिन हो गए थे। हैरानी की बात यह थी कि उसने फोन नहीं किया था, न घर, न दफ़्तर। उसकी परेशान सेक्रेटरी के कई फ़ोन आए थे। बेवकूफ लड़की, इतनी घबराई, इतनी परेशान। विभा ने उससे कहा कि वह उसके सारे अप्वाइंटमेंट रद्द कर दे- एक हफ़्ते के लिए, एक महीने के लिए या जब तक ठीक समझे, तब तक। वह इसी लायक है! उसने यह बतलाने की भी जहमत नहीं की कि वह है कहां? ठीक है, उसे अस्पताल नापसंद थे, लेकिन कम-से-कम एक बार जाकर उन्हें देख तो आती। ज़रूरत पड़ जाती तो शायद साथ भी रह लेती। क्या वे मर चुकीं? नहीं, कदापि नहीं। तब वह उन्हें घर ले आता- यानी उनके शव को। उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। उसे शवों से और ज्यादा नफ़रत थी।

ठीक है, अभी वह अपने दोस्तों के साथ लंच के लिए जा रही थी। तो बुरी बातों का खयाल क्यों करे, गाड़ी की चाबी उठाते हुए उसने सोचा। वह अपनी छुट्टियों का पूरा इस्तेमाल करेगी। कौन जानता है, कब उसे शोक मनाना पड़ जाए। वह खयाल ही दिल डुबाने वाला था। तभी घंटी बजी। उसे किसी के आने का इंतज़ार नहीं था। ठीक है, जो होगा, जल्दी विदा कर देगी। वह तेज़ी से दरवाज़े की तरफ बढ़ी...और अचंभित खड़ी रह गई, जब सामने हंसते रोहित को खड़े देखा।



‘आखिर तुम थे कहां?’ हड़बड़ाई सी वह बोली।

’मैंने उड़ान भरी...बर्फ भी पड़ रही थी। क्या तुम मानोगी, मैंने वाकई बर्फ देखी’, पीछे से बूढ़ी औरत चहचहा रही थी।

हैरान, उसने अपनी सास को घूरा। हे भगवान! बीमार सास काफ़ी नहीं थी क्या जो अब एक खिसकी बूढ़ी औरत से भी निबटना पड़ेगा।

’क्या तुमने कभी बर्फ देखी है, बहू?’

’हां, कई बार,’ विभा ने सर्द आवाज़ में कहा, "मैं शिमला में पढ़ी हूँ।"

‘लो, मैं भूल ही गई थी। क्या वहाँ हर साल बर्फ पड़ती है? तब अगली सर्दी में हम सब चलेंगे,‘ वे खुशी से हंस रही थीं।

रोहित ने कुछ शर्मिन्दगी से पत्नी को देखा। बूढी औरत खुशी-खुशी अपने कमरे की तरफ़ जा चुकी थी।

‘तुम उन्हें यहां क्यों ले आए?’ विभा फट पड़ी, ‘क्या तुम सोचते हो, मैं एक पागल के साथ रहूंगी?’

’वे पागल नहीं हैं विभा। उन्होंने वाकई बर्फ देखी है। हम श्रीनगर गए थे। मेरा इरादा अगले दिन लौट आने का था, लेकिन हम फंस गए...‘

’वाकई? जाते वक़्त मुझे बतला कर नहीं जा सकते थे? टिकट तो पहले से ले रखे होंगे न?" उसने तंज़ से कहा।

‘पहले कोई योजना नहीं थी। वह मर रही थीं और हवाई जहाज़ में बैठना उनकी आख़िरी इच्छा थी। मैं- मैं बस, यों ही, अंतःप्रेरणा पर टिकट ले आया- बतलाने का वक़्त नहीं था।‘ उसने बेबसी से पत्नी के खीझे चेहरे को देखा। उसे नाराज़ होने का हक है। कम से कम...

’पर श्रीनगर क्यों? बर्फ, वाह! करिश्मा ही समझो कि वे मरी नहीं।‘

’वे बेहद ख़ुश थीं। हवाई जहाज़ में बैठते ही उन पर जादू हो गया। और बर्फ...वे सातवें आसमान पर थीं। मैंने उन्हें कभी, एक बार भी इतना खुश नहीं देखा। वे तो बर्फ पर चलना भी चाहती थीं,‘ वह हंसा।

बर्फ पर चलना! लंबे समय से भूली बचपन की तमन्ना लौटी और विभा का दिल जोर से धड़क उठा। हर जाड़े में जब शिमला में बर्फ पड़ती और स्कूल की लंबी छुट्टी में वह अपने मम्मी-पापा के साथ मैदान में होती तो बर्फ के लिए मचलती। कुछ दिन ठहर कर पहली बर्फ देखने के उसके सहमे सुझाव को उसके पिता ‘बेतुका’ बतला कर ख़ारिज कर देते। "उस खाली बोर्डिंग हाउस में तुम ठिठुर कर मर जाओगी," उसकी मां का फैसला होता।

एक बार उन्होंने उसकी इच्छा के आगे हार मानी थी और उसे बर्फबारी दिखाने ले गए थे। जब वे पहुंचे थे, तो धूप खिली मिली थी और संतुष्ट पिता ने उसका पूरा फ़ायदा उठाते हुए अपनी मॉर्निंग वॉक ज़ारी रखी थी। ‘बर्फ पड़े या नहीं, चार दिन में हम लौट जाएंगे’, उनका अकाट्य फैसला था। आख़िरी सुबह जब वह जगी तो पिता बेचैन टहल रहे थे और मां धीरे-धीरे कुछ बुदबुदा रही थी। बाहर बर्फ पड़ रही थी। उसने दरवाज़े की तरफ ज़ोरदार दौड़ लगाई, लेकिन मां ने बेरुख़ी से उसे वापस खींच लिया। खिड़की से नाक सटाए, वह बर्फबारी देखती रही और उसके मां-पापा जल्द से जल्द वहाँ से निकलने की गुंजाइश पर बहस करते रहे।

‘इस बार मैं मफ़लर ले चलूंगी- बर्फ में घूमने के लिए ज़रूरी है। मेरे पास कुछ ऊन पड़ी है...एक तुम्हारे लिए भी बुन दूंगी, रोहित। और तुम्हारे लिए भी बहू, अगर तुम साथ चलो," वे वहां खड़ी चहक रही थीं।

हैरान विभा ने एक झुर्रियाए चेहरे को अपनी तरफ़ उम्मीद से देखते पाया। पहली बार, उसने वाक़ई उन्हें देखा, उनसे अजीब-सा लगाव महसूस किया। उसे हैरानी हो रही थी कि वह, ऊँचाई पर पहुँची, कामयाब करिअर वूमन, एक सीधी-सादी अनपढ़, घर में बंद औरत के साथ, अरसे से संजोया सपना, साझा कर सकती है। हां, वे एक जैसी हैं, वे दोनों, बर्फ से जुड़ी हुईं।

’कौन सा रंग पसंद करोगी?’ बर्फ-सी उजली आवाज़ पूछ रही थी।

‘सारे ... इंद्रधनुष जितने रंग,‘ उसने खुशी खुशी जवाब दिया।

‘मुझे नहीं लगता, मेरे पास उतने रंग हैं,‘ बूढे़ चेहरे ने याद करने की कोशिश की।

‘फिक्र मत कीजिए। मैं ला दूंगी।‘अपना बैग उठाते हुए विभा हंसी। उसे देर हो रही थी, उसके दोस्त इंतज़ार कर रहे होंगे।

‘तुम जा कहां रही हो?’ एक हंसते चेहरे से दूसरे हंसते चेहरे को देखते हुए, हैरान  रोहित ने पूछा।

‘ऊन लाने के लिए।‘उसकी मां हंसी।

मूल अंग्रेज़ी से अनुवादः प्रियदर्शन

Sunday, August 31, 2014

मैं तुझे फिर मिलूँगी - अमृता प्रीतम



आज अमृता प्रीतम जी का जन्मदिन है। संयोग ही है कि पिछले कई दिनों से मैं उनकी कहानियाँ पढ़ रही हूँ। इन कहानियों से गुजरने का अहसास अद्भुत है, बस गूंगे का गुड़ जानिए। अमृता जी की एक कविता मुझे बेहद पसंद है। आज फिर से इसे पढ़ रही हूँ, आप भी पढ़िये.......





मैं तुझे फिर मिलूँगी

मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
शायद तेरे कल्पनाओं
की प्रेरणा बन
तेरे केनवास पर उतरुँगी
या तेरे केनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
या सूरज की लौ बन कर
तेरे रंगो में घुलती रहूँगी
या रंगो की बाँहों में बैठ कर
तेरे केनवास पर बिछ जाऊँगी
पता नहीं कहाँ किस तरह
पर तुझे ज़रुर मिलूँगी
या फिर एक चश्मा बनी
जैसे झरने से पानी उड़ता है
मैं पानी की बूंदें
तेरे बदन पर मलूँगी
और एक शीतल अहसास बन कर
तेरे सीने से लगूँगी
मैं और तो कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूँ
कि वक्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है
पर यादों के धागे
कायनात के लम्हें की तरह होते हैं
मैं उन लम्हों को चुनूँगी
उन धागों को समेट लूंगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
मैं तुझे फिर मिलूँगी!!
 
इसे पंजाबी में पढ़ने के बाद मालूम होता है कि अपनी मादरे-ज़बान में अमृता का कोई सानी नहीं........

मैं तैनू फ़िर मिलांगी
कित्थे ? किस तरह पता नई
शायद तेरे ताखियल दी चिंगारी बण के
तेरे केनवास ते उतरांगी
जा खोरे तेरे केनवास दे उत्ते
इक रह्स्म्यी लकीर बण के
खामोश तैनू तक्दी रवांगी
जा खोरे सूरज दी लौ बण के
तेरे रंगा विच घुलांगी
जा रंगा दिया बाहवां विच बैठ के
तेरे केनवास नु वलांगी
पता नही किस तरह कित्थे
पर तेनु जरुर मिलांगी
जा खोरे इक चश्मा बनी होवांगी
ते जिवें झर्नियाँ दा पानी उड्दा
मैं पानी दियां बूंदा
तेरे पिंडे ते मलांगी
ते इक ठंडक जेहि बण के
तेरी छाती दे नाल लगांगी
मैं होर कुच्छ नही जानदी
पर इणा जानदी हां
कि वक्त जो वी करेगा
एक जनम मेरे नाल तुरेगा
एह जिस्म मुक्दा है
ता सब कुछ मूक जांदा हैं
पर चेतना दे धागे
कायनती कण हुन्दे ने
मैं ओना कणा नु चुगांगी
ते तेनु फ़िर मिलांगी
(पंजाबी)

Friday, August 8, 2014

बलिदान (कहानी) - सुशांत प्रिय








सुशांत सुप्रिय की सक्रियता बरबस ध्यान खींचती हैं।  वे लगातार लिख रहे हैं, कवितायें और कहानियों के बाद इन दिनों वे अनुवाद के क्षेत्र में लगातार विश्व साहित्य की अच्छी कहानियों से हिन्दी के पाठकों को परिचित करा रहे हैं।  उनकी एक कहानी मुझे मेल से मिली है।  किस्से के अंदाज़ में गढ़ी गई ये कहानी स्वयंसिद्धा के पाठकों से साझा करते हुए उनकी किस्सागोई की सराहना करना चाहूंगी।  आप भी पढ़िये :


मेरे परदादा बड़े ज़मींदार थे । वे कई गाँवों के स्वामी थे । उन्होंने कई मंदिर बनवाए थे।  कई कुएँ और तालाब खुदवाए थे । कई-कई कोस तक उनका राज चलता था । वे अपनी वीरता के लिए भी विख्यात थे । एक बार ' लाट साहब ' के साथ जब वे घने जंगल में शिकार पर गए थे तब एक खूँखार नरभक्षी बाघ ने पीछे से ' लाट साहब ' पर अचानक हमला कर दिया था । तब परदादा जी ने अकेले ही बाघ से मल्ल-युद्ध किया ।हालाँकि इस दौरान वे घायल भी हो गए पर इसकी परवाह न करते हुए उन्होंने बाघ के मुँह में अपने हाथ डाल कर उसका जबड़ा फाड़ दिया था और उस बाघ को मार डाला था । परदादाजी की वीरता से अंग्रेज़ बहादुर बहुत ख़ुश हुआ था।  अपनी जान बचाने के एवज़ में ' लाट साहब ' ने उन्हें ' रायबहादुर ' की उपाधि भी दी थी ।


             हालाँकि आज जो सच्ची घटना मैं आपको बताने जा रहा हूँ उसका सीधे तौर पर इस सबसे कुछ लेना-देना नहीं है । हमारे गाँव चैनपुर के बगल में एक और गाँव था--- धरहरवा । वहाँ साल में एक बार बहुत बड़ा मेला लगता था । हमारे गाँव और आस-पास के सभी गाँवों के लोग उस मेले की प्रतीक्षा साल भर करते थे। मेले वाले दिन सब लोग नहा-धो कर तैयार हो जाते और जल-पान करके मेला देखने निकल पड़ते । हमारे गाँव में से जो कोई मेला देखने नहीं जा पाता उसे बहुत बदक़िस्मत माना जाता । हमारे गाँव चैनपुर और धरहरवा गाँव के बीच भैरवी नदी बहती थी ।साल भर तो वह रिबन जैसी एक पतली धारा भर होती थी । पर बारिश के मौसम में कभी-कभी यह नदी प्रचण्ड रूप धारण कर लेती थी । तब कई छोटी-छोटी सहायक नदियों और नालों का पानी भी इसमें आ मिलता था । बाढ़ के ऐसे मौसम में भैरवी नदी सब कुछ निगल जाने को आतुर रहती थी । यह कहानी भैरवी नदी में आई ऐसी ही भयावह बाढ़ से जुड़ी है ।

               यह बात तब की है जब मेरी परदादी के पेट में मेरे दादाजी थे । उस बार जब धरहरवा गाँव में मेला लगने वाला था तो मेरी परदादी ने परदादाजी से कहा कि इस बार वह भी मेला देखने जाएँगी । यह सुन कर परदादा जी मुश्किल में फँस गए ।

वैसे तो कई-कई कोस तक किसी भी बात के लिए उनका हुक्म अंतिम शब्द माना जाता था पर वे मेरी परदादी से बहुत प्यार करते थे । उन्होंने परदादी जी को मनाना चाहा कि ऐसी अवस्था में उनका मेला देखने जाना उचित नहीं होगा । पर परदादी थीं कि टस-से-मस नहीं हुईं । परदादाजी प्रकाण्ड विद्वान् भी थे । उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान था । किन्तु उनकी सारी विद्वत्ता परदादी जी के आगे धरी-की-धरी रह गई । वे किसी भी भाषा में परदादी जी को नहीं मना पाए । परदादी जी की देखा-देखी या शायद उनकी शह पर घर-परिवार की सारी औरतों ने मेला देखने जाने की ज़िद ठान ली ।  हार कर परदादाजी और घर के अन्य पुरुषों को घर की औरतों की बात माननी पड़ी ।

                पुराना ज़माना था । ज़मींदार साहब की घर की औरतों के लिए पालकी वाले बुलाए गए । भैरवी नदी के इस किनारे पर एक बड़ी-सी नाव का बंदोबस्त किया गया । लेकिन उस सुबह नदी में अचानक कहीं से बह कर बहुत ज़्यादा पानी आ गया था । नदी चौड़ी, गहरी और तेज़ हो गई थी । बाढ़ जैसी स्थिति की वजह से उसने ख़तरनाक रूप ले लिया था । पर मेला भी साल में एक ही बार लगता था । अंत में घर के सब लोग , कुछ नौकर-नौकरानियाँ , पालकियाँ और पालकी वाले भी उस डगमगाती नाव पर सवार हुए । राम-राम करते हुए किसी तरह नदी पार की गई । इस तरह नदी के उस पार उतर कर सब लोग धरहरवा गाँव में मेला देखने पहुँचे।

         
      मेला पूरे शराब पर था । चारो ओर धूम मची हुई थी । तरह-तरह के खेल-तमाशे थे । नट और नटनियों के ऐसे करतब थे कि आदमी दाँतों तले उँगली दबा ले । एक ओर गाय , भैंसें , और बैल बिक ़रहे थे । दूसरी ओर हाथी और घोड़े बेचे और खरीदेजा रहे थे । दूसरे इलाक़ों के ज़मींदार लोग भी मेले में पहुँचे हुए थे । कहीं ढाके का मलमल बिक रहा था तो कहीं कन्नौज का इत्र बेचा जा रहा था । कहीं बरेली का सुरमा बिक रहा था तो कहीं फ़िरोज़ाबाद की चूड़ियाँ बिक रही थीं । ख़ूब रौनक़ लगी हुई थी ।

               सूरज जब पश्चिमी क्षितिज की ओर खिसकने लगा तो मेला भी उठने लगा ।  दुकानदार अँधेरा होने से पहले सामान समेट कर वापस लौट जाना चाहते थे । परदादाजी ने ख़ास अरबी घोड़ा ख़रीदा । घर-परिवार की औरतों ने भी अपने-अपने मन का बहुत कुछ ख़रीदा । परदादाजी तीन भाई थे । वे सबसे बड़े थे । उनके बाद मँझले परदादाजी थे । फिर छोटे परदादाजी थे । शाम ढलने लगी थी । सब लोग उस बड़ी-सी नाव पर सवार हो गए । नदी का पानी पूरे उफान पर था । हालात और ख़राब हो गए थे।


दूर-दूर तक नदी का दूसरा किनारा नज़र नहीं आ रहा था । मल्लाहों ने परदादाजी से विनती की कि इस बाढ़ में नाव से नदी पार करना बड़े जोख़िम का काम था । पर परदादाजी के हुक्म के आगे उनकी क्या बिसात थी । सब लोग उस डगमगाती नाव में सवार हो गए । परदादाजी ने अपने अरबी घोड़े को भी नाव पर चढ़ा दिया । घर-परिवार की सभी औरतें, नौकर-चाकर , पालकियाँ और पालकी वाले--सब नाव पर आ गए ।

                 नदी किसी राक्षसी की तरह मुँह बाएँ हुए थी । उफनती नदी में वह नाव किसी खिलौने-सी डगमगाती जा रही थी । नदी के बीच में पहुँच कर नाव एक ओर झुक कर डूबने लगी । औरतों ने रोना-चीख़ना शुरू कर दिया । मल्लाहों ने चिल्ला कर परदादाजी से कहा कि नाव पर बहुत ज़्यादा भार था । उन्होंने कहा कि नाव को हल्का करने के लिए कुछ सामान नदी में फेंकना पड़ेगा ।

                 
 परदादाजी ने सामान से भरे कुछ बोरे नदी में फिंकवा दिए । नाव कुछ देर के लिए सम्भली पर बाढ़ के पानी के प्रचण्ड वेग से एक बार फिर संतुलन खो कर एक ओर झुकने लगी । फिर से चीख़-पुकार मच गई । अब और सामान नदी में फेंक दिया गया । पर नाव थी कि सम्भलने का नाम ही नहीं ले रही थी और एक ओर झुकती जा रही थी । मल्लाह लगातार भार हल्का करने के लिए चिल्ला रहे थे ।

                    आख़िर परदादाजी ने दिल पर पत्थर रख कर अपने अरबी घोड़े को उफनती धाराओं के हवाले कर दिया । उन्हें देख कर लगा जैसे वे अपने जिगर का टुकड़ा क्रुद्ध भैरवी मैया के हवाले कर रहे हों । नाव ने फिर कुछ दूरी तय की । लेकिन कुछ ही देर बाद वह दोबारा भयानक हिचकोले खाने लगी । नाव को चारों ओर से इतने झटके लग रहे थे कि नाव में बैठी परदादीजी की तबीयत ख़राब होने लगी थी । जब नाव ज़्यादा झुकने लगी तो मल्लाह एक बार फिर चिल्लाने लगे । परदादाजी के मना करने के बावजूद अबकी बार कुछ नौकर-चाकर और पालकी वाले जिन्हें तैरना आता था, नदी में कूद गए । नाव उफनती धारा में तिनके-सी बहती चली जा रही थी । मल्लाह नियंत्रण खोते जा रहे थे ।

                     अंत में नाव में केवल चार मल्लाह, घर-परिवार के सदस्य और कुछ नौकरानियाँ ही बचे रह गए । लग रहा था जैसे उस दिन सभी उसी नदी में जल-समाधि लेने वाले थे । सब की नसों में प्रलय का शोर था । शिराओंं में भँवर बन रहे थे । साँसें चक्रवात में बदल गई थीं । परदादाजी को कुछ समझ नहीं आ रहा था । उनकी बुद्धि के सूर्य को जैसे ग्रहण लग गया था । मल्लाह एक बार फिर चिल्लाने लगे थे ।

                     परदादाजी , मँझले परदादाजी और छोटे परदादाजी -- तीनों अच्छे तैराक थे । लेकिन बाढ़ से उफनती सब कुछ लील लेने वाली प्रलयंकारी नदी में तैरना किसी शांत तालाब में तैरने से बिलकुल उलट था । एक बार फिर फ़ैसले की घड़ी आ पहुँची । किसी ने सलाह दी कि नौकरानियाें को नदी में धकेल दिया जाए । लेकिन तीनों परदादाओं ने यह सलाह देने वाले को ही डाँट दिया । बल्कि पहले छोटे परदादा , फिर मँझले परदादा परदादाजी से गले लगे और उनके लाख रोकने के बावजूद दोनों उस बाढ़ से हहराती , उफनती नदी में कूद गए । घर की औरतें रोने-बिलखने लगीं । लेकिन नाव थोड़ी सीधी हो गई ।

                      अब दूसरा किनारा दिखने लगा था । लगा जैसे नाव किसी तरह उस पार पहुँच जाएगी । तभी बाढ़ के पानी का समूचा वेग लिए कुछ तेज लहरें आईं और नाव को बुरी तरह झकझोरने लगीं । उस झटके से चार में से दो मल्लाह उफनती नदी में गिर कर बह गए । नाव अब बुरी तरह डगमगा रही थी । दोनों मल्लाह पूरी कोशिश कर रहे थे पर नाव एक ओर झुक कर बेक़ाबू हुई जा रही थी । दोनों मल्लाह फिर चिल्लाने लगे थे । किनारा अब थोड़ी ही दूर था लेकिन नाव लगातार एक ओर झुकती चली जा रही थी । वह किसी भी पल पलट कर डूब सकती थी ।

                        औरतें एक बार फिर डर कर चीख़ने लगी थीं ।  दोनों मल्लाह भी चिल्ला रहे थे । और उसी पल परदादाजी ने आकाश की ओर देख कर शायद कुल-देवता को प्रणाम किया और नदी की उफनती धारा में कूद गए । औरतें एक बार फिर विलाप करने लगीं ।

                         परदादाजी के नदी में कूदते ही एक ओर लगभग पूरी झुक गई नाव कुछ सीधी हो गई । औरतों के विलाप और भैरवी नदी की उफनती धारा के शोर के बीच ही दोनों मल्लाह किसी तरह उस नाव को किनारे पर ले आए ।

                         परदादाजी किनारे कभी नहीं पहुँच पाए । मँझले परदादा और छोटे परदादा का भी कुछ पता नहीं चला । उस शाम नाव से नदी में कूदने वाले हर आदमी को भैरवी नदी की उफनती धाराओं ने साबुत निगल लिया ।

                        तीनों परदादाओं और अन्य सभी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया । बाढ़ और मातम के बीच उसी रात परदादी ने दादाजी को जन्म दिया , वर्षों बाद जिन्हें आज़ाद भारत की सरकार ने स्वाधीनता-संग्राम में उनके योगदान के लिए शाॅल और ताम्र-पत्र दे कर सम्मानित किया ।

                        लेकिन इस बलिदान से जुड़ी असली बात तो मैं आपको बताना भूल ही गया । बाढ़ के उस क़हर की त्रासद घटना के बाद से आज तक , पिछले नब्बे सालों में भैरवी नदी में फिर कभी कोई डूब कर नहीं मरा है । इलाक़े के लोगों का कहना है कि हर डूबते हुए आदमी को बचाने के लिए नदी के गर्भ से कई जोड़ी हाथ निकल आते हैं जो हर डूबते हुए आदमी को सुरक्षित किनारे तक पहुँचा जाते हैं । इलाक़े के लोगों का मानना है कि परदादाजी, मँझले परदादाजी , छोटे परदादाजी और नौकरों-चाकरों की रूहें आज भी उस नदी में डूब रहे हर आदमी की हिफाज़त करती हैं ।

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सुशान्त सुप्रिय ( परिचय)
                        
 जन्म २८ मार्च, १९६८  पटना में
शिक्षा-दीक्षा अमृतसर , पंजाब तथा दिल्ली में
पंद्रह वर्षों से संसदीय सचिवालय में अधिकारी
दिल्ली में रिहाइश
प्रकाशन : दो कथा-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं: 'हत्यारे' (२०१०) तथा 'हे राम' (२०१२)।
पहला काव्य-संग्रह ' एक बूँद यह भी ' 2014 में  प्रकाशित
अनुवाद की एक पुस्तक ' विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ ' प्रकाशनाधीन है ।
सभी पुस्तकें नेशनल पब्लिशिंग हाउस , जयपुर से प्रकाशित
कई भाषाओं में कहानियाँ और कवितायें अनूदित, सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन

कविता " इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं " पूना वि. वि. के बी. ए.    (द्वितीय वर्ष ) पाठ्यक्रम में शामिल। दो कहानियाँ , " पिता के नाम " तथा " एक हिला हुआ आदमी " हिन्दी के पाठ्यक्रम के तहत कई राज्यों के स्कूलों में क्रमश: कक्षा सात और कक्षा नौ में पढ़ाई जा रही हैं। आगरा वि. वि. , कुरुक्षेत्र वि.वि. तथा गुरु नानक देव वि.वि., अमृतसर के हिंदी विभागों में कहानियों पर शोध।
       
 'हंस' में 2008 में प्रकाशित कहानी " मेरा जुर्म क्या है ? " पर short film बनी है ।  अंग्रेज़ी काव्य-संग्रह ' इन गाँधीज़ कंट्री ' हाल ही में प्रकाशित हुआ है।  अंग्रेज़ी कथा-संग्रह ' द फ़िफ़्थ डायरेक्शन' प्रकाशाधीन।
        

          

Wednesday, August 6, 2014

कार्टूनिस्ट प्राण के साथ कॉमिक्स का दौर अब खत्म हुआ






"कार्टूनिस्ट प्राण" यह नाम  80 या नब्बे के दशक के बचपन से कुछ इस तरह वाबस्ता है कि इसके बिना बचपन की कल्पना काफी हद तक नीरस और बेरंगी मालूम होती है।  चाचा चौधरी, साबू, बिल्लू, पिंकी, रमन, श्रीमतीजी जैसे चर्चित कार्टूनों के जरिए घर-घर में मशहूर हुए कार्टूनिस्ट प्राण का 76 साल की उम्र में निधन हो गया। वह पिछले कई साल से कैंसर से पीड़ित थे। पिछले 10 दिनों से वह अस्पताल के इंटेसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में भर्ती थे, जहां मंगलवार रात उन्होंने अंतिम सांस ली।  उनके साथ ही मानों कॉमिक्स की दुनिया का एक सुनहरा दौर भी खत्म हो गया। 



प्राण का जन्म 15 अगस्त, 1938 को लाहौर में हुआ था। पूरा नाम प्राण कुमार शर्मा था, लेकिन वह प्राण के नाम से ही मशहूर हुए।   1960 में उन्होने दिल्ली से छपने वाले अखबार 'मिलाप' में बतौर कार्टूनिस्ट अपने करियर की शुरुआत की थी।  कॉमिक्स की दुनिया के चर्चित किरदार चाचा चौधरी को उन्होंने सबसे पहले हिंदी बाल पत्रिका 'लोटपोट' के लिए बनाया था। इसके बाद वह भारतीय कॉमिक जगत के सबसे सफल कार्टूनिस्टों में से गिने जाने लगे।   चाचा चौधरी और साबू के अलावा भी डायमंड कॉमिक्स के लिए प्राण ने कई अन्य कामयाब किरदारों को जन्म दिया। इनमें रमन, बिल्लू और श्रीमतीजी जैसे कॉमिक चरित्र शामिल थे।


राजनीति विज्ञान के स्नातक और फाइन आर्ट्स के छात्र रहे प्राण ने जब 1960 के दशक में कॉमिक स्ट्रिप बनाना शुरू किया, जो उस वक्त भारत में इस लिहाज से बिल्कुल नया था और कोई देसी किरदार मौजूद नहीं था।  अगर 1960 के दशक से पहले की बात करें तो प्राण साहब से पहले शायद ही किसी ने ऐसी कोशिश की होगी। उनकी कोशिश पूरी तरह कामयाब भी रही।  विशुद्ध भारतीय कॉमिक कैरक्टर पहली बार अस्तित्व में आए जिन्हे हाथोंहाथ लिया गया।  ये एक तरह से भारतीय बच्चों की दुनिया पर काबिज मिकी, डोनाल्ड, स्पाईडरमैन, मेंड्रेक आदि के समानान्तर एक ऐसी सीरीज़ का गठन था जो बेहद अपनी सी लगती थी और सहज ही बालमन पर अपनी छाप छोड़ जाती थी।  भारतीय कॉमिक चरित्र, पर्फेक्ट कॉमिक टाइमिंग और समसमयिक विषयों पर पकड़ जैसी कुछ बातों ने उन्हे न केवल बच्चों बल्कि कई पीढ़ियों के पसंदीदा कार्टूनिस्ट के तौर पर स्थापित कर दिया।  शायद ही किसी अन्य कार्टूनिस्ट को इतनी कामयाबी मिली होगी जो प्राण साहब को मिली।  


बीबीसी को दिये एक इंटरव्यू में प्राण साहब ने बताया था,  "ऐसा नहीं है कि कार्टूनिस्ट नहीं थे. मुझसे बेहतर थे मेरे सीनियर जैसे शंकर, कुट्टी और अहमद लेकिन वे सब राजनीतिक कार्टून बनाते थे. मुझे लगा कि राजनीति तो वक्त के साथ पुरानी पड़ जाएगी क्यों न ऐसे सामाजिक क़िरदार बनाऊं जो हम जैसे हों. मेरी समझ से कार्टून पत्रकारिता की एक शाखा है."
 

आगे वे कहते हैं,  "उस वक्त जितनी भी कॉमिक्स बाज़ार में मौजूद थीं उन सब में विदेशी चरित्र थे जैसे मेंड्रेक, ब्लॉंडी वगैरह. हालांकि जब मैंने माता-पिता को बताया तो सबने कहा कि क्या मिलेगा तुम्हें, कोई लड़की तुमसे शादी नहीं करेगी. लेकिन मैंने कहा कि मैं तय कर चुका हूं. अब तो यही करना है."

 
 उनके कार्टून कैरक्टर्स की लोकप्रियता का यह आलम रहा कि पिछली कई पीढ़ियों में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी आदि से परिचित न हो।  ये वह वक़्त था जब कॉमिक्स की दुनिया का स्वर्णिम दौर था, इस दौर से कितनी मदद प्राण साहब को मिली या प्राण साहब से कितनी मदद इस दौर के उत्थान को मिली ये कहना जरा मुश्किल है।  दरअसल दोनों एक दूसरे के पूरक साबित हुए।  वह दूरदशन और आकाशवाणी का जमाना था।  केबल टीवी नेटवर्क और इंटरनेट से ठीक पहले का दौर था।  तब बच्चों के लिए कॉमिक्स ठंडी हवा के उस झोंके के तरह था जो कुछ घंटों के लिए उन्हे पढ़ाई से निजात दिलाता था, माँ-बाप भी खुश थे कि किसी न किसी रूप में बच्चे किताबों से खुद को जोड़ रहे थे।  डायमंड कॉमिक्स की सीरीज़ ने ऐसे समय को भुनाया और बच्चों को अपना मुरीद बना लिया और इसमें प्राण साहब का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। स्थानीय विषयों का चुनाव, चुटीला व्यंग्य और अपने ही घर-बाहर के आस पास दिखनेवाले किरदार बाज़ार पर इस कदर छा गए कि जल्दी ही डायमंड कॉमिक्स हर घर में होना जरूरी हो गया।   


प्राण साहब में कामयाबी का एक लंबा दौर देखा है और वे अंतिम समय तक काम करते रहे।  सक्रियता का तो ये आलम था कि अंतिम समय तक वे काम कर रहे थे।  उन्होंने पाठकों के लिए आगे तक का काफी कॉमिक्स पहले से ही बना दिया था। 


आज का बचपन किताबों से नाता तोड़कर फिर से केबल टीवी और इंटरनेट की शरण में हैं।  भारतीय चरित्रों पर ज्यादा प्रयोग हो नहीं रहे हैं और छोटा भीम जैसे इक्का-दुक्का  कार्टून को छोडकर  एक बार फिर, शिनचैन, डोरेमोन, निंजा हथोड़ी जैसे विदेशी कार्टूनों का दौर है।  हिन्दी या इंग्लिश में डब किए गए इन कार्टूनों में चुंबन लेते छोटे बच्चे हैं जिनके गाल बड़ी उम्र की लड़की तक को देखकर लाल हो जाते है।  हर बच्चे के पास एक पर्फेक्ट क्रश भी है जिसे रिझाने का कोई मौका वह छोडना नहीं चाहता।  अंत में यदि कोई संदेश मिलता भी है तो तमाम तरह की फूहडताओं से गुजरने के बाद।  सोचने का समय है आखिर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को किया दिखा रहे हैं।   

 
तमाम तरह के एनिमेशन कोर्सेस के युग में  कार्टूनों के संदर्भ में देखा जाए तो कॉमिक्स में अब बच्चों की रुचि नहीं और यूं भी कार्टून बनाना आज खतरे से खाली नहीं है।  खुद प्राण साहब कई बार ये चिंता जाहिर कर चुके थे कि किसी भी कार्टूनिस्ट को आज पहले जैसी  स्वतन्त्रता नहीं है। फतवे और जुलूस के साथ साथ तमाम तरह की नाराज़गियाँ मोल लेने के बाद भी आज कितने कार्टूनिस्ट हैं जिन्हे कामयाबी मिल रही है।  जो हैं वो किसी भी तरह के नए प्रयोगों से बचना चाहते हैं  ऐसे में प्राण साहब का चले जाना कार्टून्स की दुनिया में उस स्थान का खाली होना है जिसे शायद ही कभी भरा जा सके।   उन्हे भावभीनी श्रद्धांजलि।