Wednesday, June 1, 2016

नास्टैल्जिया : हिंदी फिल्मों का पियानो युग










अभी मेरी दोस्त सुनीता ने फेसबुक पर एक पियानो धुन साझा की तो याद आया कि पियानो को लेकर खासा आकर्षण था हमारी पीढ़ी के बच्चों में। हम लोग स्कूल डेस्क को पियानो मानकर सलीके से बजाने की नकल करते हुए पसंदीदा पियानो गीत गाया करते और ये दीवानगी हो भी क्यों न दूरदर्शन के चित्रहार में हर तीसरा गाना पियानो पर जो फिल्माया जाता था। आज़ादी से पहले और बाद की फिल्मों में एक पियानो गीत जरूर होता था। कहीं पढ़ा था कि अंग्रेजों में हर संभ्रांत घर में पियानो का होना लाज़मी था। अंग्रेज़ियत का खासा असर था उस दौर की फिल्मों में जब क्लब सांग, बैकग्राउंड में नाचती विदेशी मेमों, बॉलरूम डांसिंग, चा चा चा और पियानो का होना बेहद जरूरी था।


किसी गीत के मुख्य बिंदु यही होते थे, पियानो पर अदाएं बिखेरकर इज़हार-ए-मुहब्बत करती नायिका, उसे देख चेहरे पर मुस्कान के साथ आँखों में प्यार का समन्दर लिए बांका नायक और किसी कोने में उन्हें देख गुस्से में सिगार के साथ दिल फूंकता नायिका का पिता या विलेन। ये दृश्य कुछ यूँ भी हो सकता था कि किसी पार्टी में अपनी मजबूरियों की दुहाई देता, इशारे से पियानो की धुन पर दर्द बिखेरता नायक और चेहरे पर भावों का जलजला लिए हुए नायिका। कभी नायक दो हो जाते और कभी नायिकाएं दो, दोनों ही पियानो पर बजती धुनों पर अपना अधिकार समझते सपनों के महल सजाया करते। मतलब ये कि मामला इज़हार का हो या इक़रार का या फिर सरासर इनकार का, पियानो ने हमेशा अपनी भूमिका शिद्दत से निभाई है।


जो गाना सबसे पहले स्मृतियों में जगह बनाता है वह था फ़िल्म बाबुल का गीत, मिलते ही आँखें दिल हुआ दीवाना किसी का....इसके अलावा धीरे धीरे मचल (अनुपमा), गीत गाता हूँ मैं (लाल पत्थर), मैंने तेरे लिए ही सात रंग के (आनंद), प्यार दीवाना होता है (कटी पतंग), चलो एक बात फिर से अजनबी (गुमराह), किसी पत्थर की मूरत से (हमराज़), सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नहीं देती (मुक्ति),  आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले (राम और श्याम), मधुबन खुशबू देता है (साजन बिना  सुहागन), ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना (मुकद्दर  का सिकंदर), जीत ही लेंगे बाजी हम तुम (शोला  और शबनम), ये कौन आया रोशन हो गई महफ़िल (साथी), कौन आया के निगाहों में चमक  जाग उठी (वक़्त), दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर (ब्रह्मचारी) और भी न जाने कितने कितने सुरीले नगमें हैं हमारी हिंदी फिल्मों में जो पियानो के जिक्र के बिना अधूरे रह जाएंगे।

इसी के साथ सुनिए पियानो पर गाया अनुपमा फिल्म का ये  गीत....



3 comments:

  1. सुन्दर आलेख । उपयोगी जानकारी ।

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 'शो मस्ट गो ऑन' को याद करते हुए - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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