Monday, March 30, 2015

राजेश्वर वशिष्ठ की कविताएँ



आज राजेश्वर वशिष्ठ जी का जन्मदिन है।  इन दिनों एक कवि के रूप में उनकी सक्रियता बराबर कविताओं के माध्यम से चिन्हित की जा रही है।  आधुनिकता की अंधी दौड़ में बिसरा दिए जाने वाले रिश्ते उनकी कविताओं में सांस लेते हैं। वहीं स्त्रियों के पक्ष में वे बिना किसी लाग-लपेट के, बहुत मुखरता से अपनी बात रखने की कोशिश करते हैं।  पिछले दिनों मिथकों को लेकर उन्होंने कविता में कई शानदार और सफल प्रयोग किये जिन्हें ख़ासा पसन्द किया गया। इनका कविता-संकलन 'सुनो वाल्मीकि' किताबनामा प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है, उनके पाठकों सहित मुझे भी इसका शिद्दत से इंतेज़ार है। राजेश्वर जी को संग्रह और जन्मदिन की हार्दिक बधाई और अनवरत सृजनात्मकता की शुभकामनाओं के साथ उनकी कुछ कविताएँ आज यहाँ आप लोगों के लिए साझा कर रही हूँ....



बहनें

बहनें मुझे रोज़ याद नहीं आतीं
जैसे याद नहीं आता दुनिया में अपना होना
जीवन और मृत्यु के बीच
एक पुल बनाए रखने के लिए
लगातार साँस लेना

बहनें मुझे याद आती हैं त्यौहारों पर
देवियों और देवताओं की तरह
सुबह सुबह एक अनुष्ठान की तरह
उनसे पूछता हूँ उनके हाल चाल
दोहराता हूँ कुछ बहुत घिसे-पिटे वाक्य

प्रणाम, नमस्कार होता है उनके परिवारजनों से
और बहनें फूल कर कुप्पा हो जाती हैं

हर प्रश्न के उत्तर में
सुनाई देती है उनकी खिलखिलाहट
वे कोई शिकायत नहीं करतीं
अपने घर परिवार और ज़िंदगी के बारे में
 वे जानती हैं सूर्य से अलग होने के बाद
सबको घूमना ही होता है अपनी परिक्रमा में
अपनी अपनी धुरी पर घूमते हुए

वे बड़े-बड़े आग्रह नहीं करती भाई से
बार बार मना करती हैं कुछ भी लेने से
वे नहीं चाहतीं
कोई भी जान पाए यह राज़
कि भाई की झोली में
 देने को कुछ भी नहीं है
मीठे बोलों के सिवाय

वे नहीं चाहतीं भाई की आँखों में दिखें
विवशता के आँसू
उन क्षणों में उनमें प्रवेश कर जाती है
माँ की आत्मा
भाई और उसके परिवार पर
लुटाते हुए असंख्य आशीर्वाद

वे बदल कर भूमिका
चुपचाप सँभाल आती हैं
 बूढ़े माता पिता को
झूठमूठ सुना देती हैं
उन्हें भाई की व्यस्तता की कहानियाँ
वे घर के किसी कोने में
ढूंढती हैं अपना अतीत
जिसे वे रख कर भूल गयी थीं
स्वर्ण-मुद्राओं की तरह
उन क्षणों में
भगीरथी हो जाती हैं बहनें

बहनों,
आज स्नेह और सम्मान से
याद कर रहा हूँ तुम्हे
साथ में लिए हुए उस विश्वास को
 जो तुमने चुपके से डाल दिया था
मेरी खाली जेब में
कीमती सिक्के की तरह

तुम्हारा होना ही आश्वस्ति है
सूर्य और आकाश गंगा के सम्बंधों की!



 एक पगले नास्तिक की प्रार्थना

 मुझे क्षमा करना ईश्वर
मुझे नहीं मालूम कि तुम हो या नहीं
कितने ही धर्मग्रंथों में
कितनी ही आकृतियों और वेशभूषाओं में
नज़र आते हो तुम
यहाँ तक कि कुछ का कहना है
नहीं है तुम्हारा शरीर

अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ ईश्वर
अगर तुम्हारा शरीर ही नहीं है
तो तुम कर ही नहीं पाओगे प्रेम
और अगर तुम्हारा शरीर है
तो बहुत सारे लोग तुम्हें करेंगे प्रेम
वे तुम्हें लेकर महानता से भरी
कहानियाँ गढ़ लेंगे
और कहेंगे कि तुम
उनके स्वप्न पूरे करते हो

पर ईश्वर, तुम फिर भी
किसी से प्रेम नहीं कर पाओगे
क्योंकि प्रेम के लिए
शरीर में स्पंदन भी ज़रूरी है
और कोई धर्म अपने ईश्वर के शरीर में
स्पंदन बर्दाश्त नहीं कर सकता
उन्हें तो सलीब पर लटका
बाँसुरी बजाता
या निराकार ईश्वर चाहिए
जो बस ईश्वर होने भर की पुष्टि करे

आज मुझे
तुम्हारी ज़रूरत महसूस हो रही है ईश्वर
आज सुबह तुम्हारे हर रूप को
प्रणाम किया है मैंने
हर बार दोहराई है एक छोटी-सी प्रार्थना
अगर वह स्वीकार हो जाती है
तो मैं इन सभी तर्कों के विरुद्ध कहूँगा
मुझे तुम पर भरोसा है

तुम्हारे होने या न होने से
मुझे क्या फर्क पड़ना है!


पश्चाताप

 विश्वास को उसने
किसी किले की दीवार की तरह खड़ा किया था

मैंने भी कितने ही क़िस्से सुनाएं थे
उसे अपनी कुशल राजगीरी के
 मैंने ज़रूर कहा होगा ताजमहल से लेकर
कुतुब मीनार तक का निर्माण
मेरी ही प्रजाति ने किया है
मैंने ज़रूर कहा होगा, तुम निश्चिंत रहो
इस दीवार की मजबूती के लिए
इसके भीतर रखा
एक एक कोहिनूर सुरक्षित है

वह आश्वस्त थी
उसदीवार की मजबूती के लिए
जैसे सभी होते हैं
किसी पर विश्वास करने के बाद

उस दीवार में सब कुछ था
मसलन पत्थर, लोहा और सीमेंट
उसकी भावनाएं थीं, स्वाभिमान था
 और मेरा आश्वासन भी
बस पानी में ही कुछ नमक ज़्यादा था
पता नहीं यह नमक उसके आँसुओं से आया
या मेरे आँसुओं में था

हुआ यह कि पहली ही बरसात में दीवार बदरंग हो गई
बड़े शौक से बनाई गई खिड़कियाँ
दीवानी हो कर चिल्लाने लगीं
कि उनके बिना साँस भी नहीं ले सकती यह दीवार
उन खिड़कियों को पता नहीं किस बढ़ई ने बनाया था

मैं जानता हूँ, मौसम पर किसी का नियंत्रण नहीं
बरसात को रोका नहीं जा सकता
खिड़कियों को भी हर वक्त बंद नहीं रखा जा सकता
पर मुझे इस दीवार को बचाना ही होगा
 यह मेरे लिए दायित्व भी है और नैतिकता भी

अब मैं उस दीवार पर
अपनी चमड़ी मढ़ देना चाहता हूँ
ताकि ढ़का जा सके एक आहत स्त्री का विश्वास
पुरुष की चमड़ी से ज़्यादा ढीठ और बेशर्म
किसी पदार्थ की जानकारी नहीं है मुझे
इससे बेहतर पश्चाताप और कैसे करूँ?


छेदी राम

हम दोनों तीस साल पहले मिले थे
छेदी राम की इस छोटी सी दुकान पर
इंडिया एक्सचेंज के पास वाली गली में
मुझे नहीं पता था कलकत्ते की बारिश में
दिल्ली के बने जूतों के सोल
किसी नाव की तरह बह जाते हैं
मुझे आश्चर्य था
बालूजा का नया जूता पहली ही बारिश में
जनता के विश्वास की तरह बिखर गया
उन दिनों लोगों के पास
दर्ज़न भर जूते भी नहीं हुआ करते थे
मेरे पास तो दूसरा भी नहीं था
कराहते जूते लिए
प्रवीर ने मुझे छेदी से मिलवाया
और हम दोस्त बन गए
तब मैं और छेदी दोनों ही जवान थे
मैंने बताया, भाई बिल्कुल नया जूता है
पता नहीं क्यों सोल निकल रहा है
और पानी अंदर घुस रहा है;
छेदी ने जूते का मुआयना किया और बताया बाबू,
यह जूता बंगाल के हिसाब से नहीं बना है
मुझे अचम्भा हुआ
जूतों में भी प्रांतीयता सर्वोपरी है!
छेदी ने कहा
यहाँ चमड़े के सोल के ऊपर
रबड़ का सोल भी ज़रूरी है
क्या आप नहीं जानते
ज्योति बाबू की इंदिरा जी से अच्छी दोस्ती है
इसी दोस्ती के चलते उन्होंने बंगाल में
कांगेस को सोल विहीन कर दिया है
अब काँग्रेस के जूते में भी हुगली बहती है बाबू साहेब!
 मैं इस गूढ़ दर्शन को समझ नहीं पाया
छेदी ने समझाया ------
तो आपके इस दिल्ली वाले जूते पर
हम कलकत्ता का रबड़ सोल जड़ देते हैं
यहाँ के मशहूर चीनी जूता कारीगर
इसे ही लगाते हैं
कामरेड इसी को पहन कर दिन भर
दफ्तरों के बाहर
लाल सलाम, लाल सलाम कर कदमताल करते हैं
मैं छेदी की कलाकारी पर मुग्ध हो गया
हर नए जूते का यज्ञोपवीत संस्कार
छेदी राम ही करवाते
कुछ ऐसे इंतज़ाम करते
जो जूता बनाने वाली कम्पनियाँ
जान-बूझ कर नहीं करती थीं
वह एड़ियों पर
हवाई जहाज़ के टायर का रबड़ चिपका देता
तो मुझे वैसा ही लगता जैसे लाखोटिया जी ने
कोई टैक्स चोरी का नुस्खा बता दिया हो
जूता ठीक हो गया
यहाँ तक कि दौड़ने लगा
जिस दिन इंदिरा जी की हत्या हुई
आगजनी, लूट-पाट
और बम-बाज़ी से आतंकित शहर में
जूता, डलहौज़ी से
साल्टलेक, करुणामयी तक पैदल ही दौड़ा
उस दिन मुझे समझ आया
जूता पहनने के लिए पाँव ही नहीं
अक्ल भी ज़रूरी है।

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2 comments:

  1. सत्य की अनुभूति कराती हुई मार्मिक कविता

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  2. सुन्दर कवितायेँ

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